7 जुलाई 2026 :
कारगिल युद्ध के अमर नायक, परमवीर चक्र से सम्मानित कैप्टन विक्रम बत्रा की पुण्यतिथि पर पूरा देश उन्हें श्रद्धा, सम्मान और गर्व के साथ याद कर रहा है। 7 जुलाई 1999 को मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान देने वाले इस वीर सपूत की बहादुरी आज भी भारतीय सेना के इतिहास के सबसे गौरवशाली अध्यायों में गिनी जाती है। उनका साहस, नेतृत्व और देश के प्रति समर्पण करोड़ों भारतीयों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।
हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में 9 सितंबर 1974 को जन्मे कैप्टन विक्रम बत्रा बचपन से ही साहसी, आत्मविश्वासी और देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत थे। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने भारतीय सेना को अपना जीवन समर्पित करने का फैसला किया। सेना में शामिल होने के बाद उन्होंने जम्मू-कश्मीर राइफल्स की 13वीं बटालियन में सेवा दी और कारगिल युद्ध के दौरान अपने अद्वितीय साहस से पूरे देश का दिल जीत लिया।
साल 1999 में जब पाकिस्तानी घुसपैठियों ने कारगिल की ऊंची चोटियों पर कब्जा कर लिया, तब भारतीय सेना ने उन्हें खदेड़ने के लिए ‘ऑपरेशन विजय’ शुरू किया। इस अभियान में कैप्टन विक्रम बत्रा को प्वाइंट 5140 को दुश्मनों से मुक्त कराने की जिम्मेदारी मिली। दुर्गम पहाड़, कड़ाके की ठंड और लगातार हो रही गोलीबारी के बीच उन्होंने अपने साथियों का नेतृत्व करते हुए दुश्मन की चौकी पर कब्जा कर लिया। मिशन सफल होने के बाद रेडियो संदेश के जरिए उनके मुंह से निकले शब्द “यह दिल मांगे मोर” पूरे देश में जोश और विजय के प्रतीक बन गए। यह नारा आज भी भारतीय युवाओं में देशभक्ति और हौसले का संचार करता है।
प्वाइंट 5140 की सफलता के बाद उन्हें एक और चुनौतीपूर्ण मिशन सौंपा गया। प्वाइंट 4875 पर दुश्मनों के मजबूत ठिकानों को ध्वस्त करने के दौरान उन्होंने अपने साथियों की जान बचाने के लिए खुद सबसे आगे बढ़कर मोर्चा संभाला। भीषण संघर्ष में कई दुश्मनों को मार गिराने के बाद 7 जुलाई 1999 को वह वीरगति को प्राप्त हुए। उनका यह सर्वोच्च बलिदान हमेशा के लिए भारतीय सैन्य इतिहास में अमर हो गया।
कैप्टन विक्रम बत्रा के अद्वितीय शौर्य और असाधारण वीरता के सम्मान में भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र, देश के सर्वोच्च सैन्य सम्मान से सम्मानित किया। आज भी भारतीय सेना में उनका नाम सम्मान और गर्व के साथ लिया जाता है। उनके जीवन पर आधारित फिल्म ‘शेरशाह’ ने भी नई पीढ़ी को उनके अदम्य साहस और राष्ट्रभक्ति से परिचित कराया, जिससे लाखों युवाओं ने उनके व्यक्तित्व को और करीब से जाना।
पुण्यतिथि के अवसर पर देशभर में विभिन्न स्थानों पर श्रद्धांजलि सभाएं आयोजित की गईं। शिक्षण संस्थानों, सरकारी कार्यालयों, पूर्व सैनिक संगठनों और सामाजिक संस्थाओं ने कैप्टन बत्रा के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें नमन किया। सोशल मीडिया पर भी लाखों लोगों ने उन्हें याद करते हुए लिखा कि ऐसे वीर सपूत सदियों में जन्म लेते हैं और उनका बलिदान कभी भुलाया नहीं जा सकता।
कैप्टन विक्रम बत्रा केवल एक सैनिक नहीं, बल्कि साहस, कर्तव्यनिष्ठा, नेतृत्व और राष्ट्रप्रेम की ऐसी मिसाल हैं, जिनकी गाथा आने वाली हर पीढ़ी को प्रेरित करती रहेगी। उनका जीवन यह संदेश देता है कि देश की रक्षा और सम्मान के लिए दिया गया बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाता। भारत अपने इस अमर वीर सपूत का सदैव ऋणी रहेगा और “यह दिल मांगे मोर” की गूंज हमेशा भारतीय वीरता की पहचान बनी रहेगी।

