2 june 2026
भारत में सोना केवल आभूषण या निवेश का साधन नहीं है, बल्कि यह परिवारों की आर्थिक सुरक्षा और सांस्कृतिक परंपराओं का भी महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। अनुमान है कि देश के घरों, मंदिरों और धार्मिक संस्थानों में करीब 32,000 टन सोना जमा है। अब केंद्र सरकार इस विशाल स्वर्ण भंडार को देश की अर्थव्यवस्था से जोड़ने की संभावनाओं पर जोर दे रही है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई अवसरों पर यह बात कह चुके हैं कि भारत के पास मौजूद सोना एक बड़ी राष्ट्रीय संपत्ति है। उनका मानना है कि यदि लोगों के घरों और मंदिरों में रखा निष्क्रिय सोना आर्थिक गतिविधियों का हिस्सा बन सके, तो इससे देश को कई स्तरों पर लाभ मिल सकता है। खासतौर पर सोने के आयात पर होने वाला भारी खर्च कम होगा और विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूती मिलेगी।
हर साल आयात करना पड़ता है भारी मात्रा में सोना
भारत दुनिया के सबसे बड़े स्वर्ण उपभोक्ता देशों में गिना जाता है। शादी-ब्याह, त्योहारों और निवेश के लिए देश में सोने की मांग लगातार बनी रहती है। घरेलू मांग को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में सोना विदेशों से आयात किया जाता है। इसके बदले भारत को अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है।
आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, जब सोने का आयात बढ़ता है तो व्यापार घाटे पर दबाव बढ़ता है और विदेशी मुद्रा भंडार पर भी असर पड़ता है। ऐसे में यदि देश के भीतर मौजूद सोने का उपयोग बढ़ाया जाए तो आयात पर निर्भरता कम की जा सकती है।
पीएम मोदी की अपील का क्या है उद्देश्य?
प्रधानमंत्री मोदी का कहना है कि घरों की तिजोरियों और मंदिरों के खजानों में रखा सोना केवल निष्क्रिय संपत्ति बनकर नहीं रहना चाहिए। यदि इसे औपचारिक आर्थिक व्यवस्था में लाया जाए तो यह देश की विकास यात्रा में योगदान दे सकता है। सरकार की सोच है कि लोग स्वेच्छा से अपने सोने को ऐसी योजनाओं से जोड़ें, जहां उसका सुरक्षित उपयोग हो सके और बदले में उन्हें आर्थिक लाभ भी मिले।
पीएम मोदी ने पहले भी कहा था कि भारत को हर साल बड़ी मात्रा में सोना आयात करना पड़ता है, जबकि देश के भीतर ही विशाल मात्रा में सोना मौजूद है। यदि इस सोने का एक हिस्सा भी वित्तीय प्रणाली में शामिल हो जाए, तो देश को विदेशी मुद्रा बचाने में बड़ी मदद मिल सकती है।
कैसे बचेगा विदेशी मुद्रा भंडार?
भारत जब विदेशों से सोना खरीदता है तो भुगतान डॉलर जैसी विदेशी मुद्राओं में करना पड़ता है। इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ता है। यदि घरेलू स्तर पर उपलब्ध सोने को रीसायकल कर बाजार की जरूरतों के लिए इस्तेमाल किया जाए, तो आयात कम होगा और डॉलर की मांग भी घटेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि आयात बिल कम होने से चालू खाते का घाटा नियंत्रित रहेगा, रुपये की स्थिति मजबूत होगी और विदेशी मुद्रा भंडार को अतिरिक्त सुरक्षा मिलेगी। यही वजह है कि सरकार घरेलू स्वर्ण भंडार को आर्थिक संसाधन के रूप में देखने पर जोर दे रही है।
मंदिरों का सोना भी बन सकता है बड़ी ताकत
देश के कई बड़े मंदिरों के पास हजारों किलो सोना मौजूद है। कुछ धार्मिक संस्थान पहले भी स्वर्ण जमा योजनाओं में भागीदारी कर चुके हैं। जानकारों का मानना है कि यदि अधिक मंदिर और धार्मिक ट्रस्ट इस दिशा में आगे आते हैं तो देश के लिए बड़ी मात्रा में सोना उपलब्ध हो सकता है, जिसका उपयोग आर्थिक गतिविधियों में किया जा सकता है।
हालांकि इस विषय से धार्मिक आस्था जुड़ी होने के कारण सरकार किसी भी कदम को पूरी सावधानी और पारदर्शिता के साथ आगे बढ़ाना चाहती है।
लोगों का भरोसा जीतना सबसे बड़ी चुनौती
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारतीय परिवारों के लिए सोना केवल धातु नहीं बल्कि भावनात्मक विरासत भी है। पीढ़ियों से संचित आभूषणों और पारिवारिक संपत्ति को लेकर लोगों की संवेदनाएं जुड़ी होती हैं। इसलिए सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती लोगों का विश्वास जीतना और उन्हें यह भरोसा दिलाना है कि उनका सोना पूरी तरह सुरक्षित रहेगा।
देश की अर्थव्यवस्था को मिल सकता है नया सहारा
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि 32,000 टन सोने का एक छोटा हिस्सा भी आर्थिक प्रणाली में सक्रिय हो जाए तो भारत की वित्तीय स्थिति को बड़ा लाभ मिल सकता है। इससे सोने के आयात में कमी, विदेशी मुद्रा की बचत, निवेश को बढ़ावा और आर्थिक विकास की रफ्तार तेज करने में मदद मिल सकती है।
यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश में मौजूद इस विशाल स्वर्ण संपदा को केवल निजी संपत्ति नहीं, बल्कि राष्ट्र की आर्थिक ताकत के रूप में देखते हैं। आने वाले वर्षों में सरकार की नीतियां इस दिशा में कितनी सफल होती हैं, इस पर देश की आर्थिक रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा निर्भर करेगा।

