देहरादून ; 29.10.2026,
हरिद्वार। पतंजलि विश्वविद्यालय में आयोजित 52वें अखिल भारतीय प्राच्यविद्या सम्मेलन का गुरुवार को राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने उद्घाटन किया। तीन दिवसीय इस राष्ट्रीय स्तर के सम्मेलन में देश-विदेश से आए विद्वान, शोधकर्ता, शिक्षाविद और विद्यार्थी भारतीय प्राचीन ज्ञान, दर्शन, संस्कृति तथा साहित्य के विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श कर रहे हैं। उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए राज्यपाल ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा का उद्देश्य केवल बौद्धिक क्षमता का विकास करना नहीं, बल्कि व्यक्ति के चरित्र निर्माण, सामाजिक सद्भाव और संपूर्ण मानवता के कल्याण की भावना को मजबूत करना भी है।
राज्यपाल ने कहा कि प्राच्यविद्या भारतीय सभ्यता की जड़ों को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इसके अध्ययन से न केवल अतीत की सांस्कृतिक उपलब्धियों की जानकारी मिलती है, बल्कि विभिन्न विचारधाराओं, दार्शनिक दृष्टिकोणों और सामाजिक व्यवस्थाओं के विकास को भी समझने का अवसर मिलता है। उन्होंने कहा कि वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत और भारतीय दर्शन से संबंधित ग्रंथों में जीवन के मूल्यों, नैतिक आचरण, कर्तव्यबोध और सामाजिक समरसता के ऐसे सिद्धांत समाहित हैं, जो आज भी प्रासंगिक हैं।
आधुनिक विकास के साथ सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण जरूरी
राज्यपाल ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश की सांस्कृतिक विरासत, प्राचीन ज्ञान परंपराओं और भारतीय भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। ‘विकास भी, विरासत भी’ की अवधारणा इस बात को रेखांकित करती है कि आधुनिक प्रगति के साथ अपनी सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं को सुरक्षित रखना भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक उन्नति तभी व्यापक रूप ले सकती है, जब वह आधुनिक आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत से भी जुड़ा रहे।
उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें भारतीय ज्ञान परंपरा, मातृभाषाओं, बहुविषयक शिक्षा और अनुसंधान को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। इससे विद्यार्थियों को अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझने, विभिन्न विषयों के बीच संबंध स्थापित करने और मौलिक शोध की दिशा में आगे बढ़ने के अवसर मिलते हैं।
प्राचीन पांडुलिपियों का संरक्षण भावी पीढ़ियों के लिए महत्वपूर्ण
डॉ. बिसेन ने ज्ञान भारतम् मिशन के अंतर्गत प्राचीन पांडुलिपियों के सर्वेक्षण, संरक्षण और डिजिटलीकरण के लिए किए जा रहे प्रयासों को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि इन पांडुलिपियों में भारतीय सभ्यता, साहित्य, दर्शन, विज्ञान और बौद्धिक विकास से जुड़ी बहुमूल्य सामग्री सुरक्षित है। यदि इस ज्ञान-संपदा को व्यवस्थित रूप से संरक्षित कर आधुनिक तकनीक के माध्यम से उपलब्ध कराया जाए, तो शोधकर्ताओं और आने वाली पीढ़ियों को इसका व्यापक लाभ मिल सकता है।
उन्होंने कहा कि प्राचीन ग्रंथों और पांडुलिपियों को सुरक्षित रखना केवल संस्थानों का दायित्व नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी भी है। इनके संरक्षण के साथ-साथ उनमें उपलब्ध ज्ञान को प्रमाणिक तरीके से समझना और नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है।
शोध में प्रमाणिकता और बौद्धिक ईमानदारी पर जोर
सम्मेलन में उपस्थित युवा शोधार्थियों को संबोधित करते हुए राज्यपाल ने प्राचीन ग्रंथों के मूल पाठ, उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और दार्शनिक संदर्भों का गंभीरता से अध्ययन करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि शोध कार्य केवल उपलब्ध जानकारियों को एकत्र करने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि तथ्यों की जांच, स्रोतों की विश्वसनीयता और निष्कर्षों की पारदर्शिता पर भी विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
उन्होंने शोधकर्ताओं से आग्रह किया कि वे अध्ययन के दौरान बौद्धिक ईमानदारी को सर्वोच्च प्राथमिकता दें और प्राचीन साहित्य की व्याख्या करते समय उसके मूल संदर्भों को समझें। उनके अनुसार, प्रमाण आधारित अध्ययन से ही भारतीय ज्ञान परंपरा की वास्तविक विशेषताओं और उसकी व्यापक उपयोगिता को सामने लाया जा सकता है।
इस अवसर पर राज्यपाल ने विश्वविद्यालय के विभिन्न प्रकाशनों का लोकार्पण भी किया। सम्मेलन के माध्यम से प्राच्यविद्या से जुड़े विषयों पर अकादमिक संवाद, शोध की नई संभावनाओं और भारतीय ज्ञान-संपदा के व्यवस्थित अध्ययन को प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है।
विश्व की चुनौतियों के बीच भारतीय दर्शन की प्रासंगिकता
राज्यपाल ने कहा कि भारतीय परंपरा में ज्ञान को सदैव लोककल्याण से जोड़कर देखा गया है। ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः’ का भाव इस व्यापक दृष्टिकोण को व्यक्त करता है कि ज्ञान का अंतिम उद्देश्य सभी के सुख, स्वास्थ्य और कल्याण में योगदान देना होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में दुनिया सामाजिक असमानता, पर्यावरणीय संकट और नैतिक मूल्यों से जुड़ी अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे दौर में भारतीय ज्ञान परंपरा में निहित संतुलन, सह-अस्तित्व, संयम और समग्र चिंतन जैसे विचार महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। प्राचीन ज्ञान का अध्ययन तभी सार्थक होगा, जब उसके उपयोगी सिद्धांतों को वर्तमान परिस्थितियों से जोड़कर समाज के हित में अपनाया जाए।
तीन दिवसीय इस सम्मेलन को भारतीय प्राचीन साहित्य, दर्शन और सांस्कृतिक विरासत पर गंभीर विमर्श का महत्वपूर्ण मंच माना जा रहा है। इसमें विद्वानों और शोधकर्ताओं के विचारों के आदान-प्रदान से भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण, अध्ययन और समकालीन संदर्भों में उसकी उपयोगिता को नई दिशा मिलने की संभावना है।

