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Home»उत्तराखण्ड»नेपाल में कुदरत का कहर: भूकंप नहीं, हिमनद से टूटी बर्फ ने मचाई तबाही।
उत्तराखण्ड देश देहरादून

नेपाल में कुदरत का कहर: भूकंप नहीं, हिमनद से टूटी बर्फ ने मचाई तबाही।

Monika RawatBy Monika RawatAugust 29, 2026No Comments4 Mins Read
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देहरादून ; 29.08.2026।

नेपाल के रसुवा और धडिंग जिलों में आई अचानक बाढ़ और मलबे की घटना को लेकर शुरुआती वैज्ञानिक जांच में एक अहम जानकारी सामने आई है। प्रारंभिक आकलन के मुताबिक, इस आपदा की वजह भूकंप नहीं बल्कि हिमनद क्षेत्र में हुई गतिविधि और उसके बाद नीचे की ओर आए बर्फ व मलबे के तेज बहाव को माना जा रहा है। वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि किसी हैंगिंग ग्लेशियर के टूटने या आइस एवलांच जैसी घटना ने इस पूरी प्रक्रिया को जन्म दिया हो सकता है।

वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों के मुताबिक, ऊंचाई वाले क्षेत्र में बर्फ और चट्टानों का बड़ा हिस्सा अचानक नीचे खिसका। इस मलबे ने नदी के प्रवाह को कुछ समय के लिए बाधित कर दिया, जिससे पानी एक जगह जमा होने लगा। इसके बाद जब यह अस्थायी अवरोध कमजोर पड़ा तो जमा पानी अचानक तेज गति से नीचे की ओर बह निकला। रास्ते में दूसरी धाराओं और नदियों का पानी मिलने से इसका बहाव और ज्यादा शक्तिशाली हो गया, जिससे निचले इलाकों में भारी नुकसान की स्थिति बनी।

संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. मनीष मेहता के अनुसार, उपलब्ध शुरुआती सूचनाएं इस घटना को आइस एवलांच से जोड़ती हैं। उनका कहना है कि फिलहाल वहां किसी बड़ी ग्लेशियल झील के बनने के स्पष्ट संकेत नहीं मिले हैं। हालांकि, लंगटांग क्षेत्र के दूसरी ओर मौजूद हैंगिंग ग्लेशियर की गतिविधि को जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। ऊंचाई पर लटके ऐसे ग्लेशियरों में अस्थिरता बढ़ने पर अचानक बर्फ का बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे गिर सकता है।

अस्थायी बांध बनने के बाद बढ़ा पानी का दबाव

विशेषज्ञों के अनुसार, पहाड़ों में जब भारी मात्रा में बर्फ, पत्थर और मलबा नदी के रास्ते में आ जाता है तो कुछ समय के लिए प्राकृतिक बांध जैसी स्थिति बन सकती है। इसके पीछे पानी लगातार जमा होता रहता है। जब यह अवरोध टूटता है तो पानी सामान्य बहाव की तुलना में कई गुना अधिक तेजी से नीचे पहुंच सकता है।

नेपाल की मौजूदा घटना में भी इसी तरह की प्रक्रिया की संभावना जताई जा रही है। वैज्ञानिकों का मानना है कि बर्फ और मलबे के कारण नदी का रास्ता प्रभावित हुआ और कुछ समय बाद पानी ने उस अवरोध को तोड़ दिया। इसके साथ मिट्टी, पत्थर और बर्फ भी नीचे की ओर बहने लगे, जिससे तबाही का दायरा बढ़ गया।

जलवायु परिवर्तन से बढ़ रही हिमालयी जोखिम की चिंता

वैज्ञानिक इस घटना को केवल एक स्थानीय प्राकृतिक प्रक्रिया के तौर पर नहीं देख रहे हैं। इसके पीछे बदलती जलवायु परिस्थितियों की भूमिका की भी जांच की जा रही है। बढ़ते तापमान के कारण हिमालय के कई हिस्सों में ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं। ग्लेशियर के पीछे हटने के दौरान ढलानों पर बड़ी मात्रा में ढीली चट्टान, मिट्टी और अन्य मलबा बच जाता है।

ऐसा कमजोर और अस्थिर भूभाग बारिश या बर्फबारी के दौरान तेजी से प्रभावित हो सकता है। पानी के दबाव से मलबा खिसक सकता है, चट्टानें टूट सकती हैं और कई बार पूरा हिस्सा नदी या घाटी की ओर गिर सकता है। यदि यही प्रक्रिया ऊंचाई वाले संकरे हिमालयी क्षेत्रों में होती है, तो उसका असर कुछ ही समय में कई किलोमीटर नीचे तक पहुंच सकता है।

हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर के प्रो. राकेश कुमार मैखुरी के मुताबिक, नेपाल की घटना में ग्लेशियर से नीचे आए बर्फ और चट्टानों के बड़े मलबे के नदी में पहुंचने की आशंका महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, यदि इस मलबे ने नदी का रास्ता रोका और उसके पीछे पानी जमा हुआ, तो अवरोध टूटने के बाद अचानक आई बाढ़ ने विनाशकारी रूप ले लिया होगा।

भारत के हिमालयी राज्यों के लिए भी चेतावनी

नेपाल की घटना ने भारत के हिमालयी क्षेत्रों में भी ऐसी आपदाओं के खतरे को लेकर चिंता बढ़ा दी है। राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र के आंकड़ों में भारत में हजारों ग्लेशियर झीलों की पहचान की गई है, जिनमें बड़ी संख्या हिमालयी क्षेत्र में मौजूद है।

विशेषज्ञों का कहना है कि हर ग्लेशियर झील या हिमनद क्षेत्र तत्काल खतरे का संकेत नहीं होता, लेकिन तापमान में बदलाव, अनियमित बारिश, अचानक बर्फबारी और पहाड़ी ढलानों की अस्थिरता मिलकर जोखिम बढ़ा सकते हैं। ऐसे में ग्लेशियरों, झीलों और संवेदनशील घाटियों की नियमित निगरानी जरूरी है।

नेपाल की घटना यह भी बताती इन है कि हिमालय में आपदा केवल भूकंप से ही नहीं आती। बर्फ का अचानक टूटना, ग्लेशियर का खिसकना, भूस्खलन और नदी में प्राकृतिक अवरोध बनने के बाद उसका टूटना भी कम समय में बड़े पैमाने पर बाढ़ का कारण बन सकता है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक, आने वाले वर्षों में हिमालयी क्षेत्रों में रियल-टाइम निगरानी, मौसम आधारित पूर्व चेतावनी और ग्लेशियरों की लगातार वैज्ञानिक जांच को मजबूत करना बेहद जरूरी होगा, ताकि ऐसी घटनाओं की स्थिति में निचले इलाकों में रहने वाली आबादी को समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सके।

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