देहरादून ; 1 सितंबर 2026।
नेपाल में 26 अगस्त को आई भीषण बाढ़ और हिमालयी ग्लेशियर के ढहने से पैदा हुई तबाही का असर अब भी कम नहीं हुआ है। नेपाल और चीन के तिब्बत क्षेत्र को मिलाकर मृतकों की संख्या 1,000 के पार पहुंच चुकी है। नेपाल में अकेले 987 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है, जबकि हजारों लोग अब भी लापता हैं। राहत एजेंसियों और सुरक्षा बलों का कहना है कि जैसे-जैसे मलबे, नदी घाटियों और दुर्गम इलाकों तक पहुंच बन रही है, आपदा की असली भयावहता सामने आ रही है।
इस प्राकृतिक आपदा के बाद सबसे बड़ी चुनौती उन लोगों तक पहुंचना है जिनके बारे में अब तक कोई जानकारी नहीं मिल सकी है। खासकर रासुवा और नुवाकोट के हाइड्रोपावर प्रोजेक्टों में काम करने वाले सैकड़ों कर्मचारी अब भी लापता बताए जा रहे हैं। कई परियोजनाओं की सुरंगों में पानी, कीचड़ और चट्टानों का मलबा भर गया है, जिससे अंदर तक पहुंचना बेहद जोखिम भरा हो गया है।
सुरंगों में कैसे चल रहा है रेस्क्यू ऑपरेशन?
नेपाल में इस समय बचाव अभियान का एक बड़ा हिस्सा हाइड्रोपावर प्रोजेक्टों की सुरंगों पर केंद्रित है। रेस्क्यू टीमें भारी मशीनों से मलबा हटाने के साथ-साथ सुरंगों के भीतर रास्ता बनाने की कोशिश कर रही हैं। अंधेरे और अस्थिर सुरंगों में सर्चलाइट, ड्रोन और दूसरे तकनीकी उपकरणों की मदद ली जा रही है।
कई जगह हालात इतने खतरनाक हैं कि बचावकर्मियों को बेहद धीरे-धीरे आगे बढ़ना पड़ रहा है। सुरंग की छत या दीवार के कमजोर होने का खतरा बना हुआ है। कुछ स्थानों पर सुरंग तक पहुंचने के लिए ऊपर से रास्ता बनाने और मलबा हटाने का काम भी किया जा रहा है। रेस्क्यू टीमों का उद्देश्य केवल लोगों का पता लगाना नहीं, बल्कि सुरंग के भीतर सुरक्षित तरीके से प्रवेश कर उन्हें बाहर निकालने के लिए रास्ता तैयार करना है।
रासुवागढ़ी हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की सुरंग में नेपाली सेना की टीम तलाशी अभियान चला चुकी है, लेकिन वहां अभी तक कोई व्यक्ति नहीं मिला। इस परियोजना से जुड़े 93 लोगों की स्थिति अब भी स्पष्ट नहीं है। दूसरी ओर कई अन्य हाइड्रोपावर साइटों पर भी बड़ी संख्या में कर्मचारी लापता हैं।
भारत ने बढ़ाया मदद का हाथ
नेपाल के मुश्किल और तकनीकी रूप से जटिल रेस्क्यू ऑपरेशन में भारत की विशेषज्ञ टीम भी पहुंच चुकी है। भारत से भेजी गई 11 सदस्यीय टीम में टनल रेस्क्यू विशेषज्ञ और मेडिकल स्टाफ शामिल हैं। टीम ने बाढ़ प्रभावित इलाकों में पहुंचकर हाइड्रोपावर सुरंगों का जायजा लिया है और नेपाली सुरक्षा एजेंसियों के साथ मिलकर बचाव की रणनीति पर काम किया है।
भारतीय विशेषज्ञों की टीमें नेपाली सेना और अन्य सुरक्षा बलों के साथ चिलिमे और लांगटांग जैसे इलाकों में काम कर रही हैं। चिलिमे में सुरंग के प्रवेश मार्ग तक पहुंच बनाकर सुरक्षा व्यवस्था तैयार की गई है, जबकि लांगटांग की सुरंग में संयुक्त टीम काफी अंदर तक जाकर तलाशी ले चुकी है।
यह ऑपरेशन सिर्फ सुरंग में प्रवेश करने तक सीमित नहीं है। विशेषज्ञ यह भी देख रहे हैं कि अंदर की संरचना कितनी सुरक्षित है, मलबा किस तरह हटाया जाए और यदि कोई व्यक्ति जीवित मिलता है तो उसे सुरक्षित बाहर निकालने के लिए कौन सा रास्ता सबसे बेहतर होगा। भारत के अलावा चीन और दक्षिण कोरिया की विशेषज्ञ टीमें भी नेपाल के बचाव अभियान में सहयोग कर रही हैं।
11,000 से ज्यादा लोगों की जिंदगी बचाई गई
तबाही के बावजूद राहत और बचाव दलों ने हजारों लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया है। ताजा रिपोर्टों के अनुसार नेपाल में 11,000 से अधिक लोगों को रेस्क्यू किया जा चुका है। इस बड़े अभियान में हजारों सुरक्षाकर्मी, सेना के जवान और अन्य बचावकर्मी लगातार मैदान में हैं।
हालांकि कई इलाकों में टूटी सड़कें, बह चुके पुल, भारी मलबा और खराब मौसम राहत कार्य को मुश्किल बना रहे हैं। जिन क्षेत्रों में सड़क संपर्क पूरी तरह टूट चुका है, वहां हेलीकॉप्टरों और दूसरे उपलब्ध साधनों से पहुंचने की कोशिश की जा रही है। कई परिवार अभी भी अपने लापता परिजनों की खबर का इंतजार कर रहे हैं।
एक प्रिंसिपल की सतर्कता ने बचा दी 900 बच्चों की जिंदगी
इस भयावह आपदा के बीच नुवाकोट के Tribhuvan Trishuli Secondary School से सामने आई कहानी लोगों को उम्मीद देती है। स्कूल के प्रिंसिपल राजेंद्र दवाड़ी ने बाढ़ का खतरा भांपते ही ऐसा फैसला लिया जिसने सैकड़ों बच्चों की जिंदगी बचा दी।
26 अगस्त की सुबह दवाड़ी को इलाके में तेजी से बढ़ते खतरे की सूचना मिली। उनके पास बच्चों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने के लिए बहुत कम समय था। उन्होंने तुरंत स्कूल में मौजूद करीब 900 छात्रों की कक्षाएं रुकवाईं और सभी को ऊंचे स्थान की ओर भेजना शुरू कर दिया। जो बच्चे स्कूल बसों या रास्ते में थे, उनके वाहनों को भी वापस लौटाने की कोशिश की गई।
कुछ ही समय बाद जिस स्कूल परिसर में बच्चे पढ़ रहे थे, वहां बाढ़ का पानी, कीचड़, बड़े पत्थर और मलबा बेहद तेजी से पहुंचा। देखते ही देखते स्कूल की इमारत तबाह हो गई। लेकिन तब तक बच्चे सुरक्षित ऊंचाई पर पहुंच चुके थे।
दवाड़ी के इस फैसले ने साबित किया कि प्राकृतिक आपदा में कुछ मिनटों की सतर्कता भी सैकड़ों जिंदगियां बचा सकती है। रिपोर्टों के मुताबिक स्कूल के दो कर्मचारी समय पर सुरक्षित नहीं निकल सके और अभी भी लापता हैं।
नेपाल के सामने अब सिर्फ रेस्क्यू नहीं, पुनर्निर्माण की चुनौती
नेपाल में फिलहाल सबसे बड़ी प्राथमिकता लापता लोगों को तलाशना और प्रभावित परिवारों तक राहत पहुंचाना है। लेकिन इसके साथ ही बुनियादी ढांचे को दोबारा खड़ा करना भी बड़ी चुनौती बनने जा रहा है। बाढ़ ने सड़कों, पुलों, बिजली परियोजनाओं और घरों को भारी नुकसान पहुंचाया है।
सबसे ज्यादा चिंता उन परिवारों को लेकर है जिनके सदस्य कई दिनों से लापता हैं। सुरंगों और मलबे में फंसे लोगों तक पहुंचने के लिए रेस्क्यू टीमें लगातार काम कर रही हैं। हर गुजरते घंटे के साथ अभियान और कठिन होता जा रहा है, लेकिन बचाव दलों की कोशिश अब भी यही है कि जहां जीवन की थोड़ी भी संभावना है, वहां तलाश जारी रखी जाए।
नेपाल की इस त्रासदी ने हिमालयी क्षेत्रों में अचानक आने वाली बाढ़, ग्लेशियर टूटने और कमजोर बुनियादी ढांचे से जुड़े जोखिमों को भी सामने ला दिया है। फिलहाल पूरा ध्यान राहत और बचाव पर है, लेकिन इस आपदा के बाद भविष्य में ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए बेहतर चेतावनी व्यवस्था और सुरक्षित निर्माण पर भी गंभीरता से विचार करना होगा।

