देहरादून ; 05.09.2026।
कैलाश की ओर विदा हुईं मां नंदा, चौसिंग्या खाड़ू बना यात्रा का मार्गदर्शक; आस्था और लोक परंपराओं का अद्भुत संगम
चमोली। हिमालय की अधिष्ठात्री और उत्तराखंड की लोक आराध्या देवी मां नंदा की ऐतिहासिक बड़ी जात यात्रा आज 5 सितंबर से सिद्धपीठ कुरुड़ से शुरू हो गई। मां नंदा की डोलियों के कैलाश की ओर प्रस्थान के साथ ही पूरा नंदानगर क्षेत्र भक्तिमय हो उठा। गांव-गांव से श्रद्धालु मां नंदा के दर्शनों और यात्रा में शामिल होने के लिए पहुंच रहे हैं। यात्रा को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष उत्साह और धार्मिक उल्लास का माहौल है। इस वर्ष बड़ी जात का आयोजन 5 से 30 सितंबर तक प्रस्तावित है।
मां नंदा को माना जाता है बेटी का स्वरूप
उत्तराखंड की लोक परंपरा में मां नंदा को केवल देवी ही नहीं, बल्कि घर की बेटी के रूप में भी पूजा जाता है। मान्यता है कि नंदा देवी अपने मायके यानी पर्वतीय गांवों से विदा होकर अपने पति भगवान शिव के धाम कैलाश की ओर जाती हैं। इसी भाव को बड़ी जात की यात्रा में बेहद मार्मिक रूप से देखा जाता है।
मां नंदा की डोली जब गांवों से गुजरती है तो ग्रामीण श्रद्धालु अपनी बेटी की तरह उनका स्वागत करते हैं। जगह-जगह पूजा-अर्चना, मांगल गीत और पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। ग्रामीण अपनी सामर्थ्य के अनुसार मां नंदा को वस्त्र, आभूषण, श्रृंगार सामग्री और स्थानीय पकवान अर्पित करते हैं।
कैलाश की ओर मां नंदा की विदाई
लोक मान्यता के अनुसार यात्रा का अंतिम उद्देश्य मां नंदा को उनके ससुराल और भगवान शिव के धाम कैलाश तक विदा करना है। इसी कारण यात्रा में शामिल श्रद्धालुओं के लिए यह केवल पैदल यात्रा नहीं, बल्कि मां को बेटी के रूप में विदा करने का भावनात्मक और आध्यात्मिक अनुष्ठान भी है।
यात्रा के दौरान कई प्रमुख स्थानों पर विभिन्न क्षेत्रों की डोलियों और छंतोलियों का मिलन होता है। रामणी और आगे के पड़ावों पर मां नंदा के साथ अन्य देवी-देवताओं की डोलियों के मिलन को विशेष धार्मिक महत्व दिया जाता है।
चौसिंग्या खाड़ू की विशेष मान्यता
इस बड़ी जात की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक परंपराओं में चौसिंग्या खाड़ू का विशेष स्थान है। इस वर्ष चमोली के सुंग गांव का आठ माह का चार सींगों वाला मेढ़ा मां नंदा की यात्रा में मार्गदर्शक की भूमिका निभा रहा है। इसे जन्म से ही मां नंदा की जात के लिए समर्पित किया गया है।
परंपरा के अनुसार यात्रा के अंतिम चरण में चौसिंग्या खाड़ू की पीठ पर मां नंदा के लिए वस्त्र, श्रृंगार सामग्री, स्थानीय पकवान और आभूषण बांधे जाते हैं। होमकुंड में पूजा-अर्चना के बाद इसे इन सामग्री के साथ कैलाश की ओर अकेला विदा किया जाता है। लोकविश्वास में इसे मां नंदा के साथ उसके मायके से ससुराल की अंतिम विदाई का प्रतीक माना जाता है।
मां नंदा की यात्रा में गांव बनते हैं मायका
बड़ी जात के दौरान यात्रा मार्ग के गांवों में श्रद्धालुओं के लिए भोजन और ठहरने की व्यवस्था स्थानीय ग्रामीणों द्वारा की जाती है। इस परंपरा में ग्रामीण मां नंदा की डोली को अपने गांव की बेटी मानकर उसकी सेवा करते हैं। यही कारण है कि यात्रा के दौरान पूरा क्षेत्र एक बड़े पारिवारिक आयोजन जैसा दिखाई देता है।
कई गांवों में महिला मंगल दलों द्वारा मांगल गीत गाए जाते हैं और पारंपरिक लोकगीतों के माध्यम से मां नंदा की विदाई और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है।
होमकुंड में होगा महत्वपूर्ण धार्मिक पड़ाव
बड़ी जात यात्रा के दौरान श्रद्धालु कठिन हिमालयी मार्गों और ऊंचाई वाले पड़ावों से होकर आगे बढ़ेंगे। यात्रा का प्रमुख धार्मिक पड़ाव होमकुंड माना जाता है, जहां मां नंदा की डोली के पहुंचने पर विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इस स्थान पर पहुंचना श्रद्धालुओं के लिए यात्रा का अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पड़ाव माना जाता है। उपलब्ध कार्यक्रम के अनुसार 20 सितंबर को होमकुंड में बड़ी जात का प्रमुख आयोजन होगा।
484 गांवों की आस्था का केंद्र
बड़ी जात केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि चमोली की लोक संस्कृति, परंपराओं और सामुदायिक एकजुटता का भी प्रतीक है। यात्रा में बड़ी संख्या में गांवों के श्रद्धालु और हक-हकूकधारी शामिल होते हैं। यात्रा के दौरान हर पड़ाव पर स्थानीय लोग अपनी परंपरा के अनुसार मां नंदा का स्वागत और सेवा करते हैं।
मां नंदा की डोली के साथ चल रहे श्रद्धालुओं के जयकारों से आज चमोली की पर्वतीय घाटियां गूंज उठीं। “जय मां नंदा” के उद्घोष के बीच शुरू हुई यह यात्रा उत्तराखंड की उस गहरी लोक आस्था को सामने लाती है, जिसमें देवी और भक्त का रिश्ता केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि मां, बेटी और परिवार के भावनात्मक रिश्ते से जुड़ा हुआ है।
मां नंदा की बड़ी जात के साथ एक बार फिर हिमालय की धरती पर आस्था, परंपरा और लोक संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है।

