देहरादून ; 03.09.2026।
देहरादून। रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के स्नेह, विश्वास और सुरक्षा के संकल्प का प्रतीक माना जाता है। कई बार जिंदगी में ऐसे रिश्ते भी बन जाते हैं, जिनकी शुरुआत किसी पारिवारिक पहचान से नहीं, बल्कि एक कठिन परिस्थिति में मिले अपनत्व से होती है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और अहमदाबाद की धनगौरी बरोलिया के बीच बना रिश्ता भी कुछ ऐसा ही है। पिछले वर्ष धराली में आई आपदा के बीच महज दुपट्टे के एक छोटे से टुकड़े से शुरू हुआ यह रिश्ता आज भी धनगौरी के लिए बेहद खास बना हुआ है।
पिछले वर्ष रक्षाबंधन के आसपास धनगौरी उत्तराखंड आई थीं। इसी दौरान धराली क्षेत्र में अचानक आई बाढ़ और आपदा की स्थिति ने उनके सफर को मुश्किल में बदल दिया। वह अन्य लोगों के साथ वहां फंस गई थीं। उस समय हालात बेहद चुनौतीपूर्ण थे और प्रभावित क्षेत्र में मौजूद लोगों के बीच चिंता और अनिश्चितता का माहौल था।
आपदा की जानकारी मिलने के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी स्वयं प्रभावित क्षेत्र का जायजा लेने पहुंचे। उन्होंने वहां फंसे लोगों से मुलाकात की, उनकी परेशानियां सुनीं और उन्हें हरसंभव मदद का भरोसा दिलाया। इसी दौरान धनगौरी को भी मुख्यमंत्री से आमने-सामने मिलने का अवसर मिला।
यह मुलाकात उस समय हुई, जब रक्षाबंधन का पर्व बिल्कुल करीब था। बातचीत के दौरान मुख्यमंत्री ने धनगौरी से कहा कि यदि उनके पास राखी है तो वह उन्हें राखी बांध सकती हैं। लेकिन उस समय धनगौरी के पास राखी नहीं थी। इसके बावजूद उन्होंने इस भावनात्मक अवसर को यूं ही गुजरने नहीं दिया।
धनगौरी ने अपने दुपट्टे का एक छोटा-सा हिस्सा फाड़ा और उसे ही राखी का रूप दे दिया। उन्होंने उसी कपड़े के टुकड़े को मुख्यमंत्री की कलाई पर बांधकर भाई-बहन के रिश्ते की शुरुआत की। परिस्थितियां असामान्य थीं, राखी पारंपरिक नहीं थी, लेकिन उस पल में मौजूद भावना ने उसे धनगौरी के लिए बेहद मूल्यवान बना दिया।
धनगौरी ने अपने पत्र में लिखा है कि उसी दिन से उन्होंने मुख्यमंत्री को अपना धर्म भाई मान लिया था। उनके अनुसार, धराली की उस मुश्किल घड़ी में हुई यह मुलाकात उनके जीवन की ऐसी याद बन गई, जिसे वह कभी भुला नहीं सकतीं। एक ओर प्राकृतिक आपदा का भय था, तो दूसरी ओर मुख्यमंत्री का प्रभावित लोगों के बीच पहुंचना और उनसे संवाद करना उनके लिए भरोसा देने वाला अनुभव रहा।
अपने पत्र में धनगौरी ने उस कठिन समय को याद करते हुए मुख्यमंत्री के प्रति अपनी भावनाएं व्यक्त की हैं। उन्होंने कहा कि आपदा के बीच जब लोग परेशान और असहाय महसूस कर रहे थे, तब मुख्यमंत्री ने उनके बीच पहुंचकर उनका हौसला बढ़ाया। उन्होंने प्रभावित लोगों को यह भरोसा देने का प्रयास किया कि सरकार उनके साथ खड़ी है।
धनगौरी ने अपने भावों को धार्मिक प्रसंग से जोड़ते हुए भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी की कहानी का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार संकट की घड़ी में श्रीकृष्ण ने द्रौपदी का साथ दिया था, उसी तरह धराली की कठिन परिस्थिति में मुख्यमंत्री धामी भी उनके लिए सहारा और विश्वास का आधार बने।
एक वर्ष बीत जाने के बाद भी धनगौरी के मन में उस मुलाकात की स्मृति उतनी ही ताजा है। इस बार वह रक्षाबंधन के मौके पर उत्तराखंड में मौजूद नहीं हैं और अहमदाबाद में हैं। इसके बावजूद उन्होंने अपने धर्म भाई को राखी भेजने की परंपरा को नहीं छोड़ा। उन्होंने राखी के साथ अपना भावनात्मक पत्र भेजकर उस रिश्ते को फिर से याद किया, जिसकी शुरुआत धराली की आपदा के बीच हुई थी।
धनगौरी के लिए यह राखी केवल एक धागा नहीं है। यह उस मुश्किल दौर की याद है, जब अनिश्चितता और परेशानी के बीच मुख्यमंत्री से हुई मुलाकात ने उन्हें भावनात्मक सहारा दिया था। दुपट्टे से बनाई गई पहली राखी और इस वर्ष अहमदाबाद से भेजी गई राखी के बीच भले ही एक साल का अंतर हो, लेकिन उनके मन में उस रिश्ते की आत्मीयता आज भी कायम है।
पत्र के अंत में धनगौरी ने मुख्यमंत्री के अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना की है। उन्होंने प्रार्थना की कि मुख्यमंत्री इसी तरह पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ उत्तराखंड की सेवा करते रहें और प्रदेश के लोगों के हित में काम करते रहें।
धराली की आपदा ने जहां अपने पीछे मुश्किलों और दर्द की कई यादें छोड़ीं, वहीं उसी कठिन दौर में एक ऐसा भावनात्मक रिश्ता भी जन्मा, जो समय के साथ और मजबूत हुआ। दुपट्टे के एक छोटे से टुकड़े से बांधी गई राखी से शुरू हुई धनगौरी और मुख्यमंत्री धामी की यह भाई-बहन की डोर अब अहमदाबाद से भेजी गई राखी के जरिए एक बार फिर चर्चा में है। यह कहानी बताती है कि कई बार विपरीत परिस्थितियों में बना विश्वास ही रिश्तों को सबसे मजबूत आधार दे जाता है।

