24 june 2026
भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने एक महत्वपूर्ण सैन्य परंपरा का निर्वहन करते हुए जम्मू-कश्मीर राइफल्स और लद्दाख स्काउट्स रेजिमेंट के ‘कर्नल ऑफ द रेजिमेंट’ (मानद कर्नल) का दायित्व पुनः ग्रहण कर लिया है। यह कदम उनके अपनी मूल सैन्य विरासत और रेजिमेंट से गहरे जुड़ाव को दर्शाता है।
जनरल द्विवेदी ने पिछले वर्ष सेना प्रमुख का पदभार संभालने के बाद इस मानद जिम्मेदारी से स्वयं को अलग कर लिया था। उस समय उन्होंने सेना प्रमुख के रूप में निष्पक्ष और समग्र नेतृत्व की भावना को प्राथमिकता देते हुए किसी भी विशेष रेजिमेंट के कर्नल का पद न रखने का निर्णय लिया था। सैन्य हलकों में इस निर्णय को उनकी पेशेवर प्रतिबद्धता और नेतृत्व क्षमता का प्रतीक माना गया था।
सैन्य समारोह में हुआ औपचारिक सम्मान
इस अवसर पर आयोजित एक विशेष सैन्य समारोह में वर्तमान कर्नल ऑफ द रेजिमेंट लेफ्टिनेंट जनरल एम. पी. सिंह ने जनरल द्विवेदी को पारंपरिक ‘कर्नल बैटन’ भेंट की। सेना में यह बैटन केवल एक औपचारिक प्रतीक नहीं, बल्कि रेजिमेंट की गौरवशाली परंपराओं, सम्मान और नेतृत्व का प्रतिनिधित्व करती है।
समारोह के दौरान वरिष्ठ अधिकारियों, सैनिकों और पूर्व सैनिकों ने भी इस अवसर को रेजिमेंट के लिए गौरवपूर्ण क्षण बताया। सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस नियुक्ति से जवानों का मनोबल और रेजिमेंटल भावना दोनों मजबूत होंगे।
क्या होता है ‘कर्नल ऑफ द रेजिमेंट’?
भारतीय सेना में ‘कर्नल ऑफ द रेजिमेंट’ एक अत्यंत सम्मानजनक और मानद पद होता है। यह पद आमतौर पर किसी वरिष्ठ अधिकारी को दिया जाता है, जिसका संबंधित रेजिमेंट से लंबे समय तक जुड़ाव रहा हो और जिसने उसकी परंपराओं को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो।
इस पद पर नियुक्त अधिकारी रेजिमेंट के संरक्षक और मार्गदर्शक की भूमिका निभाते हैं। वे सैनिकों, उनके परिवारों और पूर्व सैनिकों के साथ संवाद बनाए रखते हैं तथा रेजिमेंट की एकता और गौरव को सुदृढ़ करने का कार्य करते हैं। यह पद नियमित सैन्य रैंक ‘कर्नल’ से अलग होता है और इसका महत्व मुख्य रूप से नैतिक नेतृत्व और परंपराओं के संरक्षण से जुड़ा होता है।
रेजिमेंट से गहरे रिश्ते का प्रतीक
जनरल उपेंद्र द्विवेदी का जम्मू-कश्मीर राइफल्स और लद्दाख स्काउट्स से लंबे समय का संबंध रहा है। उनके दोबारा मानद कर्नल बनने को रेजिमेंट के साथ उनके स्थायी भावनात्मक और पेशेवर रिश्ते के रूप में देखा जा रहा है।
सैन्य जानकारों का कहना है कि ऐसे पद केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं होते, बल्कि वे सेना की उन परंपराओं को जीवित रखते हैं जो पीढ़ियों से सैनिकों को एक सूत्र में बांधे हुए हैं। जनरल द्विवेदी की यह नियुक्ति रेजिमेंट के शौर्य, बलिदान और गौरवशाली इतिहास को सम्मान देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
जवानों और पूर्व सैनिकों में उत्साह
सेना प्रमुख द्वारा मानद कर्नल का दायित्व संभालने से रेजिमेंट के अधिकारियों, जवानों और पूर्व सैनिकों में विशेष उत्साह देखा जा रहा है। उनका मानना है कि शीर्ष सैन्य नेतृत्व का अपनी रेजिमेंट से जुड़ाव सैनिकों के आत्मविश्वास को बढ़ाता है और संगठनात्मक एकता को मजबूत करता है।
इस नियुक्ति ने एक बार फिर भारतीय सेना की उन मूलभूत परंपराओं को रेखांकित किया है, जिनमें नेतृत्व, निष्ठा, सम्मान और रेजिमेंटल गौरव को सर्वोच्च स्थान दिया जाता है।

