देहरादून ; 09.09.2026।
देश आज परमवीर चक्र विजेता कैप्टन विक्रम बत्रा की जयंती पर उनके अदम्य साहस, शौर्य और सर्वोच्च बलिदान को श्रद्धापूर्वक याद कर रहा है। 9 सितंबर 1974 को हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में जन्मे कैप्टन बत्रा ने अपने छोटे से सैन्य जीवन में देश के इतिहास पर ऐसी अमिट छाप छोड़ी, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। कारगिल युद्ध के दौरान उनकी बहादुरी और नेतृत्व ने उन्हें देश के सबसे सम्मानित वीर योद्धाओं की श्रेणी में ला खड़ा किया।
आज उनकी जयंती के अवसर पर देशभर में उनके शौर्य को नमन किया जा रहा है। भारतीय सेना के इस वीर अधिकारी ने वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध में दुश्मन के कब्जे वाली दुर्गम चोटियों को वापस लेने के लिए चलाए गए अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ऊंची पहाड़ियों, कठिन मौसम और दुश्मन की भारी गोलीबारी के बावजूद उन्होंने अपने साथियों का मनोबल बनाए रखा और हर चुनौती का डटकर सामना किया।
प्वाइंट 5140 पर फहराया तिरंगा
कारगिल युद्ध के दौरान कैप्टन विक्रम बत्रा ने प्वाइंट 5140 पर कब्जा करने के अभियान में अग्रिम मोर्चे से अपनी टुकड़ी का नेतृत्व किया। बेहद कठिन परिस्थितियों में उन्होंने जिस साहस के साथ अभियान को अंजाम तक पहुंचाया, उसने उनकी वीरता को अलग पहचान दी। इस सफलता के बाद उनका जोशीला उद्घोष ‘ये दिल मांगे मोर’ देशभर में उनके अदम्य आत्मविश्वास और जज्बे की पहचान बन गया।
लेकिन कैप्टन बत्रा की वीरता यहीं नहीं रुकी। इसके बाद उन्हें प्वाइंट 4875 पर कब्जा करने के बेहद चुनौतीपूर्ण अभियान की जिम्मेदारी मिली। यह क्षेत्र रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ दुश्मन के मजबूत प्रतिरोध के कारण बेहद खतरनाक था। इसके बावजूद कैप्टन बत्रा ने अपने जवानों का नेतृत्व करते हुए आगे बढ़कर दुश्मन का मुकाबला किया।
साथियों के लिए खुद खतरे में डाल दी जान
कैप्टन बत्रा की बहादुरी की सबसे बड़ी मिसाल उनके अंतिम अभियान के दौरान देखने को मिली। अपने साथियों को बचाने और अभियान को सफल बनाने के लिए वह स्वयं दुश्मन की गोलियों के बीच आगे बढ़े। इसी दौरान 7 जुलाई 1999 को उन्होंने मातृभूमि की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया।
उनका बलिदान केवल एक सैनिक की शहादत नहीं था, बल्कि यह भारतीय सेना की उस परंपरा का उदाहरण था जिसमें एक अधिकारी अपने जवानों को पीछे से निर्देश देने के बजाय स्वयं सबसे आगे रहकर नेतृत्व करता है। कैप्टन बत्रा ने अपने अंतिम क्षण तक देश और अपने साथियों के प्रति कर्तव्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।
परमवीर चक्र से सम्मानित हुआ अदम्य शौर्य
कारगिल युद्ध में उनके असाधारण साहस, नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत देश के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया। यह सम्मान उनके उस शौर्य की पहचान है, जिसने कारगिल की कठिन चोटियों पर भारतीय तिरंगे की आन और देश की सुरक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
आज उनकी जयंती पर कैप्टन विक्रम बत्रा को याद करते हुए देश उनके परिवार, उनके साथियों और भारतीय सेना के उन सभी वीर जवानों के प्रति भी सम्मान व्यक्त कर रहा है, जिन्होंने कारगिल की लड़ाई में देश की रक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित किया।
कैप्टन विक्रम बत्रा का जीवन आज भी युवाओं के लिए साहस, अनुशासन, नेतृत्व और राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा है। उनकी वीरगाथा आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देती रहेगी कि मातृभूमि की रक्षा का संकल्प किसी भी कठिन परिस्थिति से बड़ा होता है।
आज उनकी जयंती पर पूरा देश उस वीर सपूत को नमन कर रहा है, जिसने अपने अदम्य साहस से कारगिल की चोटियों पर भारत का परचम बुलंद किया और राष्ट्र की रक्षा के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया।

