देहरादून ; 15 अगस्त 2026।
देहरादून। सावन की फुहारों के बीच जब पहाड़ों और दून की वादियों में हर तरफ हरियाली दिखाई देती है, तब वातावरण अपने आप ही भक्ति और उत्सव के रंग में रंग जाता है। इसी आध्यात्मिक और प्राकृतिक सौंदर्य के बीच आज 15 अगस्त 2026, शनिवार को देशभर के साथ उत्तराखंड में भी हरियाली तीज का पावन पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। सावन शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाने वाला यह पर्व विशेष रूप से भगवान शिव और माता पार्वती के पवित्र मिलन, प्रेम, तपस्या और अखंड दांपत्य का प्रतीक माना जाता है।
देहरादून में भी हरियाली तीज को लेकर महिलाओं में खास उत्साह देखने को मिल रहा है। शहर में आयोजित तीज समारोहों में महिलाएं पारंपरिक परिधानों में पहुंचीं और मेहंदी, श्रृंगार, गीत-संगीत तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ पर्व की खुशियां साझा करती नजर आईं। हाल ही में देहरादून में आयोजित हरियाली तीज महोत्सव में भी महिलाओं ने बड़ी संख्या में भाग लेकर पारंपरिक संस्कृति और लोक रंग को जीवंत किया।
क्यों मनाई जाती है हरियाली तीज?
हरियाली तीज केवल एक व्रत या त्योहार नहीं, बल्कि आस्था, प्रेम, तपस्या और समर्पण की कहानी अपने भीतर समेटे हुए है। धार्मिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी वर्षों की साधना, अटूट विश्वास और समर्पण के बाद भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया।
इसी पवित्र मिलन की स्मृति में हरियाली तीज मनाई जाती है। मान्यता है कि माता पार्वती की भक्ति यह संदेश देती है कि सच्चे प्रेम में धैर्य, विश्वास और समर्पण का विशेष महत्व होता है। यही कारण है कि विवाहित महिलाएं इस दिन माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा कर अपने वैवाहिक जीवन की सुख-शांति और पति की दीर्घायु की कामना करती हैं। अविवाहित युवतियां भी अच्छे और मनचाहे जीवनसाथी की कामना से तीज का व्रत रखती हैं।
‘हरियाली’ नाम में छिपा है प्रकृति का संदेश
हरियाली तीज का नाम भी अपने आप में बेहद सुंदर संदेश देता है। सावन का महीना वर्षा, हरियाली और प्रकृति के नवजीवन का समय होता है। बारिश के बाद सूखी धरती हरे रंग की चादर ओढ़ लेती है, पेड़-पौधों पर नई कोंपलें आती हैं और वातावरण में एक नई ऊर्जा दिखाई देती है।
इसीलिए इस पर्व में हरा रंग विशेष महत्व रखता है। महिलाएं हरे वस्त्र पहनती हैं, हरी चूड़ियां पहनती हैं और मेहंदी रचाती हैं। धार्मिक आस्था के साथ यह परंपरा प्रकृति, उर्वरता, समृद्धि और नए जीवन का भी प्रतीक मानी जाती है।
देहरादून में दिखा सावन और संस्कृति का खूबसूरत संगम
देहरादून की खासियत ही यह है कि यहां पर्व केवल पूजा तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उनमें लोक संस्कृति और सामाजिक मेल-जोल का रंग भी दिखाई देता है। हरियाली तीज पर महिलाएं सज-धजकर एक-दूसरे से मिलती हैं, मेहंदी लगाती हैं, सावन के गीत गाती हैं और पारंपरिक झूलों का आनंद लेती हैं।
शहर में हुए तीज आयोजनों में भी महिलाओं ने पारंपरिक परिधान, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और उत्साह के साथ पर्व मनाया। ऐसे आयोजन केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि बदलते समय में लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी बन रहे हैं।
सोलह श्रृंगार से लेकर मेहंदी तक, हर परंपरा का अपना अर्थ
हरियाली तीज पर महिलाओं के सोलह श्रृंगार का भी विशेष महत्व माना जाता है। मेहंदी, चूड़ियां, बिंदी, सिंदूर, मंगलसूत्र और पारंपरिक आभूषणों से सजना केवल सुंदरता का हिस्सा नहीं माना जाता, बल्कि इसे सौभाग्य, प्रेम और वैवाहिक मंगल का प्रतीक माना जाता है।
कई परिवारों में तीज के अवसर पर मायके से बेटी के लिए कपड़े, श्रृंगार सामग्री, मेहंदी और मिठाइयां भेजने की परंपरा भी है। इस परंपरा को कई क्षेत्रों में सिंधारा कहा जाता है। इसके माध्यम से बेटी और मायके के बीच प्रेम और अपनत्व का रिश्ता और मजबूत होता है।
तीज की सबसे बड़ी आध्यात्मिक सीख क्या है?
हरियाली तीज की कथा केवल पति-पत्नी के रिश्ते तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक गहरा आध्यात्मिक संदेश भी छिपा है।
माता पार्वती की तपस्या हमें बताती है कि सच्ची श्रद्धा में धैर्य होता है, प्रेम में समर्पण होता है और विश्वास में शक्ति होती है। भगवान शिव और माता पार्वती का संबंध भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में आदर्श दांपत्य के रूप में देखा जाता है—जहां प्रेम के साथ समानता, विश्वास और एक-दूसरे के प्रति सम्मान भी है।
इसलिए तीज का व्रत केवल किसी मनोकामना की पूर्ति के लिए नहीं, बल्कि अपने रिश्तों में प्रेम, विश्वास और सद्भाव बनाए रखने की प्रार्थना भी है।
कहां-कहां मनाया जाता है हरियाली तीज?
हरियाली तीज मुख्य रूप से उत्तर भारत का प्रमुख पर्व है। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश सहित उत्तर भारत के कई हिस्सों में इसे बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। उत्तराखंड में भी सावन, शिवभक्ति और प्रकृति से जुड़े पर्वों की गहरी परंपरा होने के कारण तीज को विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं के साथ मनाया जाता है।
हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि हरियाली तीज को केवल उत्तराखंड का त्योहार कहना सही नहीं होगा। यह व्यापक रूप से उत्तर भारतीय हिंदू परंपरा का पर्व है, जिसकी अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी स्थानीय परंपराएं और रंग हैं।
देहरादून से उठता है आस्था और संस्कृति का संदेश
आज जब देहरादून की महिलाएं हरे परिधानों में सजीं, हाथों में मेहंदी रचाए और शिव-पार्वती की आराधना में लीन दिखाई देती हैं, तो हरियाली तीज केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति और अध्यात्म के मिलन का उत्सव बन जाती है।
सावन की हरियाली जहां धरती को नया जीवन देती है, वहीं माता पार्वती की भक्ति मनुष्य को प्रेम और विश्वास का अर्थ समझाती है। यही हरियाली तीज की सबसे खूबसूरत भावना है—बाहर प्रकृति में हरियाली और भीतर रिश्तों में प्रेम की हरियाली।
इसी कामना के साथ आज देहरादून समेत पूरे उत्तराखंड में तीज की गूंज सुनाई दे रही है—महादेव और माता पार्वती का आशीर्वाद हर घर में सुख, शांति, प्रेम और सौभाग्य की हरियाली बनाए रखे।

