1 august 2026 ; Dehradun!
देहरादून: उत्तराखंड के जंगलों में हर वर्ष लगने वाली आग के मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के वर्ष 2016 के आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि लगभग एक दशक पुराने निर्देश वर्तमान परिस्थितियों में पूरी तरह प्रभावी नहीं माने जा सकते। अदालत ने हाईकोर्ट को मामले की नए सिरे से समीक्षा कर मौजूदा जरूरतों के अनुसार आवश्यक निर्देश जारी करने का अधिकार दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पिछले वर्षों में वनाग्नि से निपटने की तकनीक, निगरानी प्रणाली और जमीनी परिस्थितियों में बड़ा बदलाव आया है। ऐसे में केवल पुराने निर्देशों पर निर्भर रहने के बजाय आधुनिक तकनीक, उपग्रह आधारित निगरानी, डिजिटल अलर्ट सिस्टम और वैज्ञानिक उपायों को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
अदालत ने यह भी माना कि 2016 में जारी कई निर्देशों पर सरकारों ने अमल किया, लेकिन इसके बावजूद राज्य में हर साल जंगलों में आग लगने की घटनाएं जारी रहीं। इससे स्पष्ट है कि केवल मानव संसाधन बढ़ाने या पुराने उपायों को दोहराने से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वनाग्नि एक निरंतर सामने आने वाली पर्यावरणीय चुनौती है, इसलिए इसकी नियमित समीक्षा और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार समय-समय पर रणनीति में बदलाव जरूरी है। अदालत ने इस दिशा में निगरानी की जिम्मेदारी उत्तराखंड हाईकोर्ट को सौंपी है, ताकि आवश्यकता पड़ने पर नए और व्यावहारिक निर्देश जारी किए जा सकें।
साथ ही, अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव दत्ता से भी आग्रह किया है कि यदि हाईकोर्ट आवश्यक समझे तो वे एमिकस क्यूरी के रूप में मामले में सहयोग प्रदान करें।
यह फैसला संकेत देता है कि बदलती जलवायु और बढ़ती वनाग्नि की घटनाओं से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए नीतियों और न्यायिक निर्देशों को समय-समय पर अद्यतन करना, आधुनिक तकनीक का उपयोग बढ़ाना और लगातार निगरानी बनाए रखना भविष्य की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता होगी।

