देहरादून ; 13.10.2026,
चमोली की उच्च हिमालयी झील में लगाए गए अत्याधुनिक सेंसर, हर दो घंटे में मिलेगा मौसम और जलस्तर का डेटा; आपात स्थिति में तुरंत भेजे जाएंगे संकेत
उत्तराखण्ड में ग्लेशियल झीलों से उत्पन्न होने वाली संभावित बाढ़ के खतरे को समय रहते पहचानने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की गई है। चमोली जिले के उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित वसुंधरा ताल में ग्लेशियल लेक आउटब्रस्ट फ्लड (GLOF) की निगरानी के लिए पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने का पहला चरण पूरा हो गया है। दुर्गम पहाड़ी परिस्थितियों और प्रतिकूल मौसम के बीच उपकरण लगाने के बाद वैज्ञानिक एवं तकनीकी दल अभियान पूरा कर लौट आया है। उत्तराखण्ड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (यूएसडीएमए) में सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन ने दल का स्वागत किया।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस पहल को राज्य की आपदा प्रबंधन व्यवस्था को आधुनिक तकनीक से मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों से जुड़े संभावित खतरों की समय रहते पहचान करना जरूरी है। वैज्ञानिक अनुसंधान, आधुनिक उपकरणों और विभिन्न संस्थानों के समन्वय से संवेदनशील क्षेत्रों में जोखिम की निगरानी तथा लोगों की सुरक्षा के प्रयासों को मजबूती मिलेगी।
मौसम, जलस्तर और बर्फ में होने वाले बदलावों पर रहेगी नजर
वसुंधरा ताल में स्थापित प्रणाली के जरिए झील के आसपास के मौसम, पानी के स्तर, बर्फ की स्थिति और जमीन में होने वाली संभावित हलचल से जुड़े आंकड़े जुटाए जाएंगे। इसके लिए कई तरह के सेंसर लगाए गए हैं, जो अलग-अलग प्राकृतिक परिस्थितियों में होने वाले बदलावों को दर्ज करेंगे।
प्रणाली में ऑल-इन-वन मौसम सेंसर शामिल है। यह हवा की गति और दिशा, वर्षा, सौर विकिरण, वायु तापमान तथा वायुदाब को मापेगा। झील के जलस्तर में होने वाले उतार-चढ़ाव को समझने के लिए फ्लोटिंग और सबमर्ज्ड वाटर लेवल सेंसर भी लगाए गए हैं।
संभावित बाढ़ से संबंधित कंपन, झुकाव और भू-गतिविधियों की निगरानी के लिए दो एक्सेलेरोमीटर और टिल्ट सेंसर स्थापित किए गए हैं। हिमस्खलन से जुड़ी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए एक अतिरिक्त एक्सेलेरोमीटर और टिल्ट सेंसर लगाया गया है। इसके अलावा बर्फ की गहराई मापने के लिए स्नो डेप्थ सेंसर तथा बर्फ की सतह के नीचे अलग-अलग गहराइयों पर तापमान दर्ज करने के लिए सात तापमान सेंसर लगाए गए हैं। झील की सतह के तापमान को मापने के लिए एक अलग सेंसर भी लगाया गया है।
इन उपकरणों से मिलने वाले आंकड़ों के विश्लेषण से वैज्ञानिकों को स्थानीय परिस्थितियों में हो रहे बदलावों को समझने में मदद मिलेगी। इससे संभावित असामान्य स्थितियों की पहचान और जोखिम का आकलन करने में उपयोगी जानकारी प्राप्त हो सकेगी।
मोबाइल नेटवर्क के बिना भी पहुंचेगा डेटा
वसुंधरा ताल की भौगोलिक स्थिति के कारण यहां सामान्य मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं है। इस समस्या के समाधान के लिए प्रणाली में इरिडियम उपग्रह संचार तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इसके जरिए सेंसरों से प्राप्त जानकारी को रुड़की स्थित केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई) और यूएसडीएमए के डैशबोर्ड तक पहुंचाया जाएगा।
सामान्य परिस्थितियों में उपकरण प्रत्येक दो घंटे में आंकड़े भेजेंगे। वहीं, किसी आपातकालीन परिस्थिति में निर्धारित समय अंतराल पूरा होने का इंतजार किए बिना तत्काल डेटा भेजने की व्यवस्था की गई है। इससे संभावित खतरे से जुड़े संकेतों का तेजी से आकलन करने में सहायता मिल सकती है।
अभियान दल ने वापस लौटने से पहले संचार व्यवस्था का परीक्षण भी किया। अधिकारियों के अनुसार, उपकरणों से भेजे गए आंकड़े संबंधित डैशबोर्ड पर अपेक्षा के अनुरूप प्राप्त हो रहे हैं। दोनों केंद्रों पर उपलब्ध डेटा की नियमित निगरानी की जाएगी।
दस दिन तक बिजली का बैकअप देने की व्यवस्था
उच्च हिमालयी क्षेत्र में मौसम तेजी से बदलता है और कई बार लंबे समय तक पर्याप्त धूप नहीं मिल पाती। ऐसे में उपकरणों का संचालन जारी रखने के लिए सौर ऊर्जा आधारित विद्युत व्यवस्था विकसित की गई है। इसमें सौर पैनलों के साथ 280 एम्पीयर क्षमता की बैटरी लगाई गई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पर्याप्त धूप नहीं मिलने की स्थिति में यह बैटरी लगभग दस दिनों तक बैकअप देने में सक्षम है।
उपकरणों की सुरक्षा और स्थिरता के लिए स्टील के मॉड्यूलर डिजाइन पर आधारित फाउंडेशन तैयार किया गया है। इसमें स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्री और पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है, जबकि सीमेंट का उपयोग नहीं किया गया। क्षेत्र में हवा की गति लगभग 15 से 50 किलोमीटर प्रति घंटा आंकी गई है। इसके बावजूद फाउंडेशन का डिजाइन 100 किलोमीटर प्रति घंटा तक की हवा को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
स्थापना के लिए ऐसे स्थान का चयन किया गया, जहां भूस्खलन और हिमस्खलन जैसी गतिविधियों का जोखिम अपेक्षाकृत कम हो। दुर्गम स्थल पर उपकरणों को सुरक्षित रखने और प्रतिकूल मौसम में उनकी कार्यक्षमता बनाए रखने को भी प्राथमिकता दी गई।
38.50 मीटर गहरी झील में किया गया तकनीकी परीक्षण
अभियान दल के प्रमुख और सीबीआरआई रुड़की के वैज्ञानिक डॉ. डीपी कानूनगो के अनुसार, वसुंधरा ताल की गहराई लगभग 38.50 मीटर, चौड़ाई करीब 600 मीटर और लंबाई लगभग 900 मीटर है। अभियान के दौरान सेंसरों की स्थापना के साथ डेटा संचार व्यवस्था की कार्यप्रणाली का परीक्षण किया गया।
उन्होंने बताया कि उपलब्ध पुराने आंकड़ों और वर्तमान स्थिति की तुलना में झील के आकार में कोई विशेष बदलाव नहीं पाया गया है। उपकरणों की स्थापना के दौरान क्षेत्र की भौगोलिक बनावट, मौसम की चुनौतियों और सुरक्षा संबंधी पहलुओं को ध्यान में रखा गया।
कई संस्थानों ने मिलकर पूरा किया अभियान
वसुंधरा ताल में पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने का अभियान राष्ट्रीय ग्लेशियल लेक आउटब्रस्ट फ्लड जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के तहत यूएसडीएमए की ओर से संचालित किया गया। इसमें सीबीआरआई रुड़की और वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, देहरादून के वैज्ञानिकों एवं तकनीकी विशेषज्ञों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अभियान के लिए समन्वय, लॉजिस्टिक सहायता और संचार उपकरण उपलब्ध कराने में यूएसडीएमए का सहयोग रहा। वहीं, राज्य आपदा प्रतिवादन बल (एसडीआरएफ), राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ) और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) ने भी अभियान में योगदान दिया।
मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने 29 सितंबर को वैज्ञानिक एवं तकनीकी दल को अभियान के लिए रवाना किया था। आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास मंत्री मदन कौशिक ने भी इस पहल को ग्लेशियल झीलों की निगरानी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया।
आगे की निगरानी और समय पर चेतावनी पर रहेगा जोर
वसुंधरा ताल में स्थापित यह प्रणाली उच्च हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक परिस्थितियों से जुड़े आंकड़े नियमित रूप से उपलब्ध कराने के उद्देश्य से तैयार की गई है। जलस्तर, मौसम, बर्फ के तापमान और भू-गतिविधियों से संबंधित सूचनाओं को एक साथ देखने से संभावित जोखिमों का वैज्ञानिक आकलन करने में मदद मिलेगी।
हालांकि, केवल सेंसर स्थापित होना अपने आप में बाढ़ की भविष्यवाणी या उससे पूर्ण सुरक्षा की गारंटी नहीं है। प्राप्त आंकड़ों का लगातार विश्लेषण, निर्धारित चेतावनी मानकों का पालन और संबंधित विभागों के बीच त्वरित समन्वय भी उतना ही जरूरी होगा। वसुंधरा ताल में पहले चरण का कार्य पूरा होने के बाद अब इस प्रणाली की नियमित निगरानी और प्रभावी संचालन हिमालयी क्षेत्रों में आपदा पूर्व तैयारी को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

