देहरादून ; 19 सितंबर 2026।
नैनीताल/अल्मोड़ा, हिमालय की गोद में बसी देवभूमि उत्तराखंड आज मां नंदा की भक्ति में डूबी हुई है। भाद्रपद शुक्ल अष्टमी के पावन अवसर पर पहाड़ के गांवों से लेकर प्रमुख नगरों तक मां नंदा-सुनंदा के जयकारों की गूंज सुनाई दे रही है। मंदिरों में घंटियों और शंखनाद के बीच वैदिक मंत्रोच्चार हो रहा है तो कहीं ढोल-दमाऊ की थाप और पारंपरिक जागरों ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया है। नंदा अष्टमी उत्तराखंड के लिए महज एक धार्मिक तिथि नहीं, बल्कि हिमालय, लोकआस्था और पहाड़ की बेटी के प्रति असीम स्नेह का पर्व है।
उत्तराखंड की लोकपरंपरा में मां नंदा को भगवान शिव की अर्धांगिनी के साथ-साथ पहाड़ की बेटी माना जाता है। यही वजह है कि नंदा अष्टमी के आयोजन में देवी की आराधना के साथ बेटी के मायके आने की भावना भी दिखाई देती है। सदियों से चली आ रही इस परंपरा में मां नंदा का स्वागत बेटी की तरह किया जाता है और उत्सव के समापन पर उन्हें डोली में बैठाकर भावुक विदाई दी जाती है।
हिमालय की बेटी हैं मां नंदा
उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में मां नंदा की आस्था बेहद गहरी है। लोकमान्यता के अनुसार नंदा और सुनंदा हिमालय की पुत्रियां हैं, जिनका विवाह भगवान शिव के साथ हुआ। पर्व विशेष पर जब मां नंदा अपने मायके यानी पहाड़ लौटती हैं तो पूरा क्षेत्र उन्हें बेटी की तरह अपने घर आई हुई मानता है।
इसी भाव के कारण नंदा अष्टमी के अवसर पर होने वाले अनुष्ठानों में केवल धार्मिक विधि-विधान ही नहीं, बल्कि पारिवारिक आत्मीयता भी दिखाई देती है। गांवों में महिलाएं पारंपरिक गीत गाती हैं, मंदिरों में भजन-कीर्तन होते हैं और श्रद्धालु मां के चरणों में फूल, अक्षत, नारियल और प्रसाद अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
कदली वृक्ष से साकार होता है मां नंदा-सुनंदा का स्वरूप
नंदा अष्टमी से जुड़े अनुष्ठानों में कदली वृक्ष का विशेष महत्व है। उत्तराखंड के कई क्षेत्रों में विधि-विधान से कदली वृक्षों को आमंत्रित किया जाता है और उनकी पूजा के बाद उन्हीं से मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमाओं का स्वरूप तैयार किया जाता है।
नैनीताल में इस वर्ष भी कदली वृक्ष लाने से लेकर उनकी पूजा और नगर भ्रमण की परंपरा निभाई गई। इसके बाद अष्टमी के अवसर पर ब्रह्ममुहूर्त में मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमाओं की प्राण-प्रतिष्ठा की गई। प्राण-प्रतिष्ठा के बाद मंदिर के कपाट श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोले गए तो सुबह से ही भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी।
यह दृश्य अपने आप में उत्तराखंड की धार्मिक परंपरा की जीवंत तस्वीर पेश करता है—एक ओर वैदिक मंत्रों की ध्वनि, दूसरी ओर घंटियों और शंखनाद की गूंज और उसके बीच ढोल-दमाऊ की पारंपरिक थाप।
अल्मोड़ा में सदियों पुरानी आस्था का उत्सव
अल्मोड़ा का नंदादेवी मेला उत्तराखंड की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कुमाऊं मंडल की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार नंदा देवी मेले का आयोजन अल्मोड़ा सहित नैनीताल, बागेश्वर, भवाली और कुमाऊं के अन्य क्षेत्रों में होता है। अल्मोड़ा का यह उत्सव चंद राजाओं के समय से जुड़ा माना जाता है।
अल्मोड़ा में इस वर्ष भी गणेश पूजन के साथ ऐतिहासिक नंदादेवी मेले का शुभारंभ हुआ। विद्यालयों के बच्चों और सांस्कृतिक दलों ने शोभायात्रा में हिस्सा लिया। कुमाऊंनी लोकगीतों, लोकनृत्यों और पारंपरिक परिधानों ने पूरे नगर को धार्मिक और सांस्कृतिक रंग में रंग दिया।
नंदा अष्टमी की रात विशेष पूजा-अर्चना के साथ मां नंदा-सुनंदा की आराधना की जा रही है। आने वाले दिनों में मां के डोले की शोभायात्रा भी निकाली जाएगी।
नैनीताल में उमड़ा आस्था का सैलाब
सरोवर नगरी नैनीताल में नंदा देवी महोत्सव का उल्लास चरम पर है। इस बार 124वां नंदा देवी महोत्सव आयोजित किया जा रहा है। महोत्सव में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ कुमाऊं की लोक संस्कृति की झलक भी देखने को मिल रही है।
नंदा अष्टमी पर ब्रह्ममुहूर्त में मां नंदा-सुनंदा की प्राण-प्रतिष्ठा के बाद जैसे ही दर्शन शुरू हुए, बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर परिसर पहुंच गए। भक्तों ने मां को अक्षत, फूल और नारियल अर्पित कर सुख, शांति और समृद्धि की कामना की। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पूरा मंदिर परिसर भक्तिमय वातावरण में डूब गया।
महोत्सव के दौरान दुर्गा सप्तशती पाठ, हवन, कन्या पूजन, महाभंडारा, सुंदरकांड और नंदा चालीसा पाठ जैसे धार्मिक कार्यक्रम भी निर्धारित हैं। इसके साथ झोड़ा, छोलिया और अन्य लोक प्रस्तुतियां उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को मंच प्रदान कर रही हैं।
ढोल-दमाऊ की थाप में सुनाई देती है पहाड़ की आस्था
नंदा अष्टमी का सबसे खूबसूरत पक्ष यह है कि यहां धर्म और लोकजीवन एक-दूसरे से अलग नहीं दिखाई देते। मंदिर में वैदिक मंत्र गूंजते हैं तो बाहर ढोल-दमाऊ की थाप पर लोक कलाकार अपनी परंपरा को जीवंत करते हैं। झोड़ा, चाचरी, छोलिया और जागर जैसे लोक रूप इस पर्व को उत्तराखंड की अपनी विशिष्ट पहचान देते हैं।
नैनीताल के नंदा महोत्सव में इस बार भी लखियाभूत, झोड़ा, छोलिया, झांकियां और स्थानीय कलाकारों की प्रस्तुतियां कार्यक्रम का हिस्सा हैं।
बेटी की तरह होती है मां नंदा की विदाई
नंदा अष्टमी की धार्मिक यात्रा का सबसे भावुक पक्ष मां नंदा-सुनंदा की विदाई है। पूजा और उत्सव के बाद जब मां का डोला निकलता है तो श्रद्धालु उन्हें बेटी की तरह विदा करते हैं। यह केवल प्रतिमाओं का विसर्जन नहीं, बल्कि पहाड़ की उस लोकभावना का प्रतीक है जिसमें बेटी के मायके आने और फिर ससुराल लौटने की भावनाएं जुड़ी हैं।
कई स्थानों पर डोले के दौरान महिलाएं पारंपरिक गीत गाती हैं। श्रद्धालु मां से अगले वर्ष फिर आने का आग्रह करते हैं। इस दौरान उत्सव का उल्लास धीरे-धीरे भावुक विदाई में बदल जाता है।
धर्म के साथ संस्कृति की भी रक्षा
नंदा अष्टमी उत्तराखंड की उस परंपरा का प्रतीक है जहां धार्मिक आस्था के साथ लोक संस्कृति पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती है। बच्चे जब पारंपरिक वेशभूषा पहनकर शोभायात्राओं में शामिल होते हैं, युवा लोकनृत्यों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं और बुजुर्ग पुरानी परंपराओं की अगली पीढ़ी को जानकारी देते हैं, तो यह पर्व केवल एक धार्मिक आयोजन न रहकर सांस्कृतिक विरासत का उत्सव बन जाता है।
अल्मोड़ा, नैनीताल, बागेश्वर और कुमाऊं के दूसरे क्षेत्रों में होने वाले नंदा देवी आयोजनों में इसी धार्मिक और सांस्कृतिक निरंतरता की झलक दिखाई देती है।
देवभूमि में आज गूंज रहा है मां का जयघोष
नंदा अष्टमी पर आज उत्तराखंड के पहाड़ों में एक ही भाव दिखाई दे रहा है—मां नंदा के प्रति श्रद्धा और अपनी बेटी के प्रति अपनापन। हिमालय की चोटियों से घिरी देवभूमि में मंदिरों की घंटियां, शंखनाद, वेद मंत्र, ढोल-दमाऊ और मां नंदा के जयकारे मिलकर ऐसा वातावरण बना रहे हैं, जिसमें धर्म और लोकजीवन एकाकार हो जाते हैं।
मां नंदा उत्तराखंड के लिए केवल आराध्य देवी नहीं, बल्कि पहाड़ की बेटी, लोकविश्वास की शक्ति और सदियों पुरानी सांस्कृतिक परंपरा की जीवंत पहचान हैं। यही वजह है कि नंदा अष्टमी आते ही पूरा उत्तराखंड अपनी बेटी के स्वागत में जैसे एक साथ खड़ा दिखाई देता है।

