17 june 2026
नैनीताल। उत्तराखंड की पर्वतीय धरती ने एक बार फिर साहस और संकल्प की नई मिसाल पेश की है। नैनीताल की आठ वर्षीय बालिका नंदा देवी साह ने 5300 मीटर (लगभग 17,480 फीट) ऊंचे गौरा माउंटेन पर सफल चढ़ाई कर एक उल्लेखनीय उपलब्धि अपने नाम दर्ज कर ली है। कम उम्र में इतनी कठिन ऊंचाई तक पहुंचना न केवल साहस का परिचायक है, बल्कि यह युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बन गया है।
नंदा देवी साह प्रसिद्ध पर्वतारोही अनित साह और एवरेस्ट विजेता तूसी साह की पुत्री हैं। पर्वतारोहण का जुनून उन्हें परिवार से विरासत में मिला है। बचपन से ही पहाड़ों और रोमांचक अभियानों के बीच पली-बढ़ी नंदा ने अपनी लगन और आत्मविश्वास से साबित कर दिया कि उम्र कभी भी बड़े सपनों की राह में बाधा नहीं बन सकती।
कठिन मौसम के बीच हासिल की सफलता
यह अभियान 3 जून से 15 जून के बीच संचालित किया गया। अनित साह के नेतृत्व में 25 सदस्यीय दल ने गंगोत्री क्षेत्र के दुर्गम पर्वतीय इलाके में चढ़ाई शुरू की। अभियान के दौरान खराब मौसम और लगातार हो रही भारी बर्फबारी ने टीम की परीक्षा ली। कई स्थानों पर प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण दल को निर्धारित मार्ग से वापस लौटना पड़ा, लेकिन इसके बावजूद नंदा देवी ने अद्भुत धैर्य और हौसले का परिचय दिया।
ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी, ठंड और बर्फ से भरे रास्तों के बीच नंदा ने अपने पिता के साथ कदम से कदम मिलाकर चढ़ाई पूरी की। उनकी इस उपलब्धि को पर्वतारोहण जगत में विशेष उपलब्धि माना जा रहा है।
बचपन से ही रोमांचक गतिविधियों में सक्रिय
नंदा देवी साह का पर्वतों से जुड़ाव कोई नया नहीं है। कम उम्र में ही वह कई प्रसिद्ध ट्रेक और पर्वतीय अभियानों का हिस्सा रह चुकी हैं। उन्होंने दयारा बुग्याल, चंद्रशिला, इंद्रहारा बेस कैंप और छोटा कैलास ट्रेक जैसे चुनौतीपूर्ण मार्गों को सफलतापूर्वक पूरा किया है।
इसके अलावा, इस वर्ष शीतकाल में उन्होंने लद्दाख हिमालय में आइस क्लाइंबिंग का अनुभव भी प्राप्त किया। लगातार मिल रहे अनुभव और प्रशिक्षण ने उन्हें कम उम्र में ही कठिन परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयार किया है।
नई पीढ़ी के लिए बनी प्रेरणा
नंदा देवी की यह सफलता केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उन सभी बच्चों के लिए प्रेरणादायक संदेश है जो बड़े सपने देखने का साहस रखते हैं। उनकी उपलब्धि दर्शाती है कि सही मार्गदर्शन, अनुशासन और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर छोटी उम्र में भी असाधारण लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं।
उत्तराखंड की इस नन्ही पर्वतारोही ने साबित कर दिया है कि हिमालय की ऊंचाइयों को छूने के लिए केवल शारीरिक क्षमता ही नहीं, बल्कि मजबूत इरादों की भी आवश्यकता होती है। आने वाले वर्षों में उनसे और भी बड़ी उपलब्धियों की उम्मीद की जा रही है।

