30 june 2026
भारतीय सेना के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी, पूर्व राज्यपाल और उत्तराखंड के प्रतिष्ठित व्यक्तित्व लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) एमएम लखेड़ा का मंगलवार को हरिद्वार में पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। उनके निधन से सेना, प्रशासनिक जगत और उत्तराखंड में शोक की लहर है। परिवार, सेना के वरिष्ठ अधिकारियों, पूर्व सैनिकों, जनप्रतिनिधियों और बड़ी संख्या में लोगों ने उन्हें अंतिम विदाई दी।
देहरादून से निकली अंतिम यात्रा
मंगलवार सुबह उनके देहरादून स्थित आवास से अंतिम यात्रा शुरू हुई। अंतिम दर्शन के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचे और पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। इसके बाद पार्थिव शरीर को हरिद्वार ले जाया गया, जहां पूरे सैन्य सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार संपन्न हुआ। अंतिम संस्कार के दौरान सेना की ओर से सम्मान स्वरूप सलामी दी गई और राष्ट्रसेवा में उनके योगदान को याद किया गया।
देश सेवा को समर्पित रहा जीवन
लेफ्टिनेंट जनरल एमएम लखेड़ा ने भारतीय सेना में लंबे समय तक सेवाएं देते हुए कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। उन्होंने विभिन्न सैन्य अभियानों और चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में नेतृत्व प्रदान किया। अपने अनुशासन, नेतृत्व क्षमता और रणनीतिक सोच के कारण वे सेना के सम्मानित अधिकारियों में गिने जाते थे। उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित सैन्य अलंकरणों से सम्मानित किया गया।
सेना के बाद भी निभाई अहम जिम्मेदारियां
सैन्य सेवा से सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने सार्वजनिक जीवन में भी सक्रिय भूमिका निभाई। उन्हें मिजोरम और पुडुचेरी का राज्यपाल नियुक्त किया गया, जहां उन्होंने प्रशासनिक जिम्मेदारियों का सफलतापूर्वक निर्वहन किया। उनकी कार्यशैली सादगी, अनुशासन और जनसेवा के लिए जानी जाती थी।
श्रद्धांजलि देने वालों का लगा तांता
उनके निधन पर सेना के वर्तमान एवं पूर्व अधिकारियों, राजनीतिक नेताओं, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों ने गहरा शोक व्यक्त किया। वक्ताओं ने कहा कि लेफ्टिनेंट जनरल एमएम लखेड़ा ने अपना पूरा जीवन राष्ट्र की सेवा और कर्तव्यनिष्ठा के लिए समर्पित किया। उनका योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बना रहेगा।
हमेशा याद किए जाएंगे
उत्तराखंड की धरती से निकलकर देश की सर्वोच्च सैन्य और संवैधानिक जिम्मेदारियां निभाने वाले लेफ्टिनेंट जनरल एमएम लखेड़ा का जीवन सेवा, समर्पण और अनुशासन का उदाहरण माना जाता है। हरिद्वार में पंचतत्व में विलीन होने के साथ एक गौरवशाली अध्याय का समापन हुआ, लेकिन राष्ट्र और समाज के प्रति उनका योगदान लंबे समय तक स्मरण किया जाता रहेगा।

