26 july 2026 ; Dehradun!
देहरादून। उत्तराखंड के शहरी निकायों में प्रभारी अधिशासी अधिकारियों (ईओ) की तैनाती को लेकर शुरू हुआ विवाद अब नया मोड़ ले चुका है। नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों में विभिन्न संवर्गों के कर्मचारियों को प्रभारी ईओ बनाए जाने के आदेश जारी होने के महज तीन दिन बाद ही शासन ने उन्हें निरस्त कर दिया। शहरी विकास मंत्री राम सिंह कैड़ा के निर्देश पर सचिव शहरी विकास ने कार्रवाई करते हुए सभी संबंधित आदेश वापस ले लिए, जिसके बाद विभाग ने नई अधिसूचना जारी कर तैनातियां रद्द कर दीं।
दरअसल, शहरी निकायों में आयोग से चयनित अधिशासी अधिकारियों को नगर निगमों में प्रभारी एसएनए (स्टेट नोडल एजेंसी) की जिम्मेदारी सौंपे जाने के बाद उनके स्थान पर क्लर्क, सफाई निरीक्षक, लेखा कर्मी और कर अधीक्षक जैसे अन्य संवर्गों के कर्मचारियों को प्रभारी ईओ का दायित्व दिया गया था। इस व्यवस्था पर सवाल उठने लगे कि जब अधिशासी अधिकारी का पद एक विशेष सेवा संवर्ग का है तो दूसरे संवर्ग के कर्मचारियों को यह जिम्मेदारी किस आधार पर सौंपी गई।
विवाद बढ़ने के बाद शहरी विकास मंत्री राम सिंह कैड़ा ने पहले इसे रिक्त पदों को देखते हुए अस्थायी प्रशासनिक व्यवस्था बताया था। उनका कहना था कि कई निकायों में अधिशासी अधिकारियों के पद खाली हैं, इसलिए कामकाज प्रभावित न हो, इसके लिए यह निर्णय लिया गया। हालांकि लगातार उठ रहे सवालों और बढ़ती चर्चा के बीच सरकार ने अपने रुख में बदलाव किया।
शनिवार को मंत्री ने सचिव शहरी विकास नितेश झा को निर्देश जारी कर 17 जुलाई को किए गए 34 प्रभारी ईओ और ईओ स्तर के स्थानांतरण एवं प्रभार संबंधी आदेश तत्काल प्रभाव से निरस्त करने को कहा। इसके बाद अपर सचिव एवं निदेशक शहरी विकास विनोद गिरी गोस्वामी ने सभी तैनाती आदेश वापस लेते हुए संबंधित आदेश निरस्त कर दिए।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब रिक्त अधिशासी अधिकारी पदों पर नियमित नियुक्ति की मांग भी तेज हो गई है। उत्तराखंड बेरोजगार संघ ने सरकार के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यदि निकायों में ईओ के पद लंबे समय से खाली हैं तो उनके लिए शीघ्र राज्य लोक सेवा आयोग को भर्ती का अधियाचन भेजा जाना चाहिए, ताकि योग्य अभ्यर्थियों को पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से अवसर मिल सके।
शहरी विकास विभाग के इस फैसले को प्रशासनिक व्यवस्था और भर्ती प्रक्रिया दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार रिक्त पदों को नियमित भर्ती से भरने की दिशा में कितनी जल्दी कदम उठाती है और निकायों में अधिशासी अधिकारियों की कमी को किस प्रकार दूर किया जाता है।

