देहरादून ; 29.09.2026।
देहरादून/चमोली। बद्रीनाथ धाम में आयोजित देवभूमि सांस्कृतिक महोत्सव को लेकर शुरू हुआ विवाद लगातार गहराता जा रहा है। शुरुआत में मामला तेज आवाज में संगीत, DJ और सांस्कृतिक कार्यक्रम के स्वरूप तक सीमित था, लेकिन अब उत्तराखंड के पर्यटन एवं धर्मस्व मंत्री सतपाल महाराज की शंख को लेकर की गई टिप्पणी ने बहस को धार्मिक मान्यताओं तक पहुंचा दिया है। महाराज ने बद्रीनाथ में संगीत को पूरी तरह प्रतिबंधित मानने की बात को गलत बताया और मंदिर के भीतर शंख नहीं बजाए जाने के पीछे वहां की एक धार्मिक मान्यता का हवाला दिया। उनके इस बयान पर चारधाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत ने कड़ी आपत्ति जताई है।
19 और 20 सितंबर को हुआ था सांस्कृतिक महोत्सव
पूरा विवाद बद्रीनाथ के टूरिस्ट अराइवल प्लाजा में 19 और 20 सितंबर को आयोजित देवभूमि सांस्कृतिक महोत्सव-2026 से जुड़ा है। आयोजन का उद्देश्य उत्तराखंड की लोक संस्कृति, सीमांत क्षेत्रों की परंपराओं, स्थानीय उत्पादों, हस्तशिल्प और पर्यटन को बढ़ावा देना बताया गया था। कार्यक्रम में सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ संगीत कार्यक्रम भी हुए। सोशल मीडिया पर कार्यक्रम के कुछ वीडियो सामने आने के बाद वहां बज रहे तेज संगीत और लोगों के नाचने को लेकर सवाल उठने लगे।
विवाद करने वाले पक्षों का कहना है कि बद्रीनाथ केवल एक पर्यटन स्थल नहीं बल्कि देश के प्रमुख धार्मिक तीर्थों में शामिल है। ऐसे में वहां होने वाले किसी भी सांस्कृतिक आयोजन का स्वरूप धाम की धार्मिक परंपराओं और स्थानीय मर्यादाओं के अनुरूप होना चाहिए। चारधाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत ने भी साफ किया कि उसकी आपत्ति सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन से नहीं, बल्कि कार्यक्रम में इस्तेमाल किए गए तेज साउंड और प्रस्तुति के तरीके से है।
प्रशासन ने सेना से मांगा स्पष्टीकरण
विवाद बढ़ने के बाद मामला प्रशासन तक पहुंचा। चमोली के जिलाधिकारी गौरव कुमार ने गढ़वाल स्काउट्स के कमांडिंग ऑफिसर को नोटिस जारी कर कार्यक्रम को लेकर स्पष्टीकरण मांगा। नोटिस में कार्यक्रम के लिए सक्षम स्तर से पूर्व अनुमति लिए जाने और तेज आवाज वाले साउंड सिस्टम के इस्तेमाल से जुड़े सवाल उठाए गए।
प्रशासन की ओर से यह भी कहा गया कि बद्रीनाथ धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र है और वहां होने वाले बड़े आयोजनों से पूजा-अर्चना तथा अन्य धार्मिक गतिविधियां प्रभावित नहीं होनी चाहिए। भविष्य में इस तरह के कार्यक्रमों के लिए प्रशासन से पूर्व अनुमति लेने की व्यवस्था पर भी जोर दिया गया है।
जिलाधिकारी की ओर से सामने आए पक्ष के मुताबिक कार्यक्रम सेना की ओर से आयोजित किया गया था। जिला प्रशासन ने आयोजन के दौरान सरकारी योजनाओं की जानकारी देने के लिए स्टॉल लगाए थे, जबकि सांस्कृतिक कार्यक्रमों और उनसे जुड़े अन्य प्रबंधों में प्रशासन की भूमिका सीमित बताई गई।
सतपाल महाराज ने कहा- बद्रीनाथ में संगीत नई बात नहीं
इसी विवाद के बीच सतपाल महाराज ने संगीत को लेकर उठ रहे सवालों पर अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि बद्रीनाथ में संगीत को पूरी तरह वर्जित बताना उचित नहीं है। अपने तर्क के समर्थन में उन्होंने धाम में कपाट खुलने और बंद होने के अवसर पर सैन्य बैंड की ओर से होने वाले वादन का उदाहरण दिया।
महाराज के मुताबिक अगर धाम में हर प्रकार का संगीत प्रतिबंधित होता, तो ऐसे पारंपरिक अवसरों पर सैन्य बैंड की प्रस्तुति की परंपरा भी नहीं होती। उन्होंने बद्रीनाथ की धार्मिक परंपराओं और वहां होने वाली गतिविधियों का उल्लेख करते हुए कहा कि संगीत और धार्मिक वातावरण के बीच अंतर को समझना जरूरी है।
शंख को लेकर मंत्री के बयान से बढ़ी गर्मी
विवाद का सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाला हिस्सा सतपाल महाराज का शंख को लेकर दिया गया बयान रहा। उन्होंने कहा कि बद्रीनाथ मंदिर के भीतर पूजा के दौरान शंख का इस्तेमाल नहीं किया जाता। इसके पीछे उन्होंने ऐसी धार्मिक मान्यता का उल्लेख किया, जिसमें शंख को अस्थि से बना माना जाता है और मंदिर के अंदर हड्डी से बनी वस्तु के इस्तेमाल को वर्जित बताया जाता है।
हालांकि, महाराज ने इसी संदर्भ में भगवान विष्णु और भगवान कृष्ण से जुड़े शंख का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मंदिर के बाहर शंख बजाने पर रोक नहीं है। उनके अनुसार इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि बद्रीनाथ क्षेत्र में शंख की ध्वनि पूरी तरह प्रतिबंधित है।
बृजेश सती ने उठाए धार्मिक और शास्त्रीय सवाल
महाराज के इस बयान पर चारधाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत के महासचिव बृजेश सती ने आपत्ति जताई है। उन्होंने शंख को जानवर की हड्डी से बना बताए जाने वाले तर्क पर सवाल खड़े किए और कहा कि सनातन परंपरा में धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान शंखनाद का विशेष महत्व रहा है।
सती ने महाराज को शास्त्रों और पुराणों का अध्ययन करने की सलाह भी दी। उनका कहना है कि धार्मिक विषयों पर सार्वजनिक बयान देने से पहले संबंधित परंपराओं और मान्यताओं की जानकारी स्पष्ट रूप से होनी चाहिए।
चारधाम महापंचायत की ओर से यह भी तर्क दिया गया है कि मंदिरों में पारंपरिक धार्मिक वाद्य और आधुनिक साउंड सिस्टम से होने वाले तेज संगीत को एक ही नजरिए से नहीं देखा जा सकता। उनके मुताबिक धार्मिक स्थलों पर होने वाले कार्यक्रमों के स्वरूप और ध्वनि की सीमा को लेकर अलग-अलग परिस्थितियों पर विचार जरूरी है।
क्या सिर्फ संगीत पर है विवाद?
बद्रीनाथ प्रकरण में अब सबसे अहम सवाल यही बन गया है कि धार्मिक स्थल पर सांस्कृतिक कार्यक्रम की सीमा क्या होनी चाहिए। एक पक्ष का तर्क है कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति और सीमांत क्षेत्रों की परंपराओं को मंच देने के लिए सांस्कृतिक आयोजन जरूरी हैं। दूसरी ओर, तीर्थ पुरोहित और धार्मिक संगठन चाहते हैं कि बद्रीनाथ जैसे धाम में ऐसे आयोजनों की रूपरेखा वहां की धार्मिक मर्यादाओं को ध्यान में रखकर तय की जाए।
यानी विवाद केवल इस बात पर नहीं है कि बद्रीनाथ में संगीत हो सकता है या नहीं। बहस इस बात को लेकर भी है कि किस तरह का संगीत, कितनी आवाज में और किस प्रकार की प्रस्तुति धार्मिक परिसर के आसपास आयोजित की जानी चाहिए।
शंख से शुरू हुई बहस अब परंपरा बनाम आधुनिक आयोजन तक
सतपाल महाराज की टिप्पणी के बाद विवाद का दायरा और बढ़ गया है। पहले जहां सवाल कार्यक्रम की अनुमति, DJ और तेज आवाज को लेकर उठ रहे थे, वहीं अब धार्मिक मान्यताओं और शंख की परंपरा पर भी सार्वजनिक बहस शुरू हो गई है।
इस बीच प्रशासन की भूमिका भी चर्चा में है, क्योंकि एक तरफ सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की बात सामने आई है, वहीं दूसरी तरफ आयोजन के बाद प्रशासन ने तेज आवाज और पूर्व अनुमति से जुड़े सवालों पर स्पष्टीकरण मांगा है।
फिलहाल बद्रीनाथ विवाद में तीन अलग-अलग पहलू सामने आ चुके हैं—सांस्कृतिक कार्यक्रम की अनुमति, धाम की धार्मिक मर्यादा और तेज आवाज में आधुनिक साउंड सिस्टम का इस्तेमाल। सतपाल महाराज के शंख संबंधी बयान ने इस बहस में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। अब देखना होगा कि प्रशासन और धार्मिक पक्ष इस पूरे मामले को आगे किस रूप में लेते हैं।

