देहरादून ; 13.09.2026।
देहरादून। उत्तराखंड की पहचान केवल यहां के पहाड़ों, प्राकृतिक सौंदर्य और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से ही नहीं, बल्कि सदियों पुरानी पारंपरिक कृषि पद्धतियों और स्थानीय फसलों से भी जुड़ी हुई है। बदलते समय के साथ पारंपरिक खेती के सामने आई चुनौतियों के बीच मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य सरकार अब स्थानीय फसलों को नई पहचान और बेहतर बाजार उपलब्ध कराने की दिशा में लगातार काम कर रही है। सरकार का प्रयास है कि पहाड़ों में उगने वाले पारंपरिक अनाज किसानों के लिए केवल घरेलू उपयोग का साधन न रहें, बल्कि उनकी आय बढ़ाने का मजबूत माध्यम बनें।
इसी उद्देश्य से मंडुआ, झंगोरा समेत अन्य पारंपरिक मिलेट्स को प्रोत्साहित करने के लिए स्टेट मिलेट पॉलिसी को आगे बढ़ाया जा रहा है। नीति के तहत स्थानीय एवं पौष्टिक अनाजों के उत्पादन से लेकर उनके प्रसंस्करण, पैकेजिंग और विपणन तक की पूरी श्रृंखला को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है। इसका सीधा लाभ किसानों को बेहतर बाजार और अपनी उपज का उचित मूल्य प्राप्त करने के रूप में मिलने की उम्मीद है।
खेत से बाजार तक मजबूत होगी पूरी व्यवस्था
धामी सरकार की पहल का उद्देश्य केवल पारंपरिक फसलों का उत्पादन बढ़ाना नहीं है, बल्कि किसानों को बाजार की बदलती जरूरतों से जोड़ना भी है। मंडुआ और झंगोरा जैसी फसलों से तैयार होने वाले उत्पादों को आकर्षक पैकेजिंग और बेहतर प्रसंस्करण के जरिए स्थानीय बाजार के साथ-साथ बड़े बाजारों तक पहुंचाने की संभावनाओं पर जोर दिया जा रहा है।
इससे किसानों के सामने अपनी उपज को केवल कच्चे अनाज के रूप में बेचने की मजबूरी कम हो सकती है। स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन को बढ़ावा मिलने से ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे उद्यम, स्वयं सहायता समूह और स्थानीय कारोबार के लिए भी नए अवसर तैयार होने की संभावना है।
पारंपरिक खेती के साथ जुड़ी है पहाड़ की अर्थव्यवस्था
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में मंडुआ और झंगोरा लंबे समय से स्थानीय खान-पान और कृषि व्यवस्था का हिस्सा रहे हैं। इन फसलों को प्रोत्साहन मिलने से प्रदेश की कृषि विरासत को संरक्षित करने के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देने का रास्ता तैयार हो सकता है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार लगातार इस बात पर जोर देती रही है कि उत्तराखंड की स्थानीय विशेषताओं को विकास का आधार बनाया जाए। ऐसे में पारंपरिक फसलों को बढ़ावा देने की नीति को पहाड़ी क्षेत्रों की परिस्थितियों के अनुरूप कृषि को मजबूत करने की महत्वपूर्ण पहल के तौर पर देखा जा रहा है।
पौष्टिक अनाजों की बढ़ती मांग का मिलेगा लाभ
मिलेट्स को लेकर देशभर में बढ़ती जागरूकता ने मंडुआ और झंगोरा जैसे पारंपरिक अनाजों के लिए बाजार की संभावनाएं भी बढ़ाई हैं। पौष्टिकता से भरपूर स्थानीय अनाजों की मांग बढ़ने के साथ उत्तराखंड के किसानों के लिए नए बाजार तलाशने का अवसर पैदा हुआ है।
सरकार की कोशिश है कि इस बढ़ती मांग का लाभ सीधे प्रदेश के किसानों तक पहुंचे। इसके लिए उत्पादन के साथ-साथ गुणवत्ता, प्रसंस्करण और विपणन व्यवस्था को बेहतर बनाने पर ध्यान दिया जा रहा है। यदि किसान को स्थानीय स्तर पर ही बेहतर बाजार और उचित मूल्य मिलता है तो इससे पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि को बनाए रखने और ग्रामीण आजीविका को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
युवाओं और ग्रामीण उद्यमिता के लिए भी खुलेंगे रास्ते
पारंपरिक फसलों को केवल खेती तक सीमित रखने के बजाय उनसे जुड़े उत्पादों के निर्माण और बिक्री को बढ़ावा देने से ग्रामीण युवाओं के लिए भी स्वरोजगार की संभावनाएं बन सकती हैं। मंडुआ के आटे और उससे तैयार होने वाले विभिन्न खाद्य उत्पादों से लेकर झंगोरा आधारित उत्पादों तक स्थानीय स्तर पर वैल्यू एडिशन की व्यापक संभावनाएं हैं।
धामी सरकार की नीति का यही व्यापक उद्देश्य है कि उत्तराखंड की पारंपरिक कृषि को आधुनिक बाजार व्यवस्था से जोड़ा जाए और गांवों में ही रोजगार एवं आय के अवसर विकसित किए जाएं। इससे पलायन की चुनौती से निपटने में भी अप्रत्यक्ष रूप से मदद मिल सकती है, क्योंकि स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधियां बढ़ने से ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका के विकल्प मजबूत होंगे।
विरासत भी बचेगी और किसानों की आय भी बढ़ेगी
मंडुआ और झंगोरा जैसी फसलों को बढ़ावा देने की पहल उत्तराखंड की कृषि परंपरा को संरक्षित करने के साथ उसे आर्थिक रूप से अधिक उपयोगी बनाने की दिशा में कदम है। धामी सरकार का फोकस पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक बाजार व्यवस्था के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने पर है।
राज्य सरकार की मंशा है कि उत्तराखंड की अपनी फसलें और स्थानीय उत्पाद प्रदेश की पहचान बनने के साथ किसानों की आर्थिक मजबूती का आधार भी बनें। ऐसे में स्टेट मिलेट पॉलिसी को पहाड़ी कृषि के पुनरोद्धार, स्थानीय उत्पादों के मूल्य संवर्धन और किसानों के लिए बेहतर आय के अवसर तैयार करने वाली महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है।
पारंपरिक फसलों को संरक्षण, आधुनिक बाजार को विस्तार और किसानों को बेहतर आय—इन्हीं तीन लक्ष्यों के साथ उत्तराखंड में मिलेट आधारित कृषि को नई दिशा देने की कोशिश की जा रही है।

