देहरादून ; 07.09.2026।
देहरादून। हिमालय दिवस के अवसर पर देहरादून में आयोजित ‘हिमालयो नाम नगाधिराज’ कार्यक्रम में हिमालय के संरक्षण और पर्वतीय क्षेत्रों के भविष्य को लेकर महत्वपूर्ण विचार सामने आए। कार्यक्रम में हिमालय को केवल प्राकृतिक संपदा के रूप में देखने के बजाय इसे उत्तराखंड की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन-व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा बताते हुए इसके संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया गया। हिमालयी पारिस्थितिकी को सुरक्षित रखते हुए विकास की गति बनाए रखने और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप योजनाओं को आगे बढ़ाने पर विशेष चर्चा हुई।
कार्यक्रम में हिमालय की प्राकृतिक विविधता, जल स्रोतों, वन संपदा और समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं को संरक्षित रखने की दिशा में सामूहिक प्रयासों की जरूरत बताई गई। वक्ताओं ने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में होने वाला विकास ऐसा होना चाहिए, जिससे प्रकृति पर अनावश्यक दबाव न बढ़े और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार, आजीविका तथा बेहतर सुविधाओं के अवसर भी तैयार हों।
हिमालय केवल पर्वत श्रृंखला नहीं, जीवन का आधार
कार्यक्रम में हिमालय की व्यापक भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा गया कि हिमालय उत्तराखंड की पहचान, संस्कृति और जीवनशैली को आकार देने वाला क्षेत्र है। यहां के जंगल, नदियां, ग्लेशियर और जैव विविधता प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश के पर्यावरणीय संतुलन के लिए महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में हिमालयी क्षेत्रों में विकास की योजनाओं को स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों और पर्यावरणीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखकर आगे बढ़ाना जरूरी है।
इस अवसर पर हिमालय की प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, संवर्धन और वैज्ञानिक तरीके से उपयोग को लेकर विचार साझा किए गए। यह भी कहा गया कि स्थानीय समुदायों को विकास प्रक्रिया से जोड़कर तथा पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान और तकनीक के साथ मिलाकर पर्वतीय क्षेत्रों के लिए अधिक प्रभावी मॉडल तैयार किए जा सकते हैं।
इकोलॉजी और इकोनॉमी के बीच संतुलन पर सरकार का जोर
कार्यक्रम में सरकार की विकास नीति के प्रमुख आधार के रूप में इकोलॉजी और इकोनॉमी के बीच संतुलन की बात सामने रखी गई। कहा गया कि उत्तराखंड के लिए विकास और पर्यावरण को एक-दूसरे के विरोध में खड़ा करने के बजाय दोनों को साथ लेकर चलना आवश्यक है। पर्यावरण सुरक्षित रहेगा तो प्राकृतिक संसाधन, पर्यटन, कृषि, जल स्रोत और स्थानीय आजीविका भी लंबे समय तक मजबूत रहेंगे।
सरकार की ओर से पर्यावरण संरक्षण के साथ प्रदेश में सतत, समावेशी और जनकेंद्रित विकास को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की गई। पर्वतीय क्षेत्रों में विकास की ऐसी दिशा तय करने पर जोर दिया गया, जिसमें स्थानीय युवाओं के लिए अवसर बढ़ें, ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हो और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव कम किया जा सके।
विज्ञान और तकनीक से जुड़ी गतिविधियों को भी मिली प्रमुखता
‘हिमालयो नाम नगाधिराज’ कार्यक्रम में पर्यावरण के साथ-साथ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को लेकर भी महत्वपूर्ण गतिविधियां हुईं। इस दौरान प्रदेश में आयोजित होने वाले विभिन्न विज्ञान आधारित आयोजनों के पोस्टर का विमोचन किया गया। इनमें द्वितीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी प्रीमियर लीग-2026, पंचम सीमांत पर्वतीय बाल विज्ञान महोत्सव, द्वितीय ज्ञानोत्कर्ष-2026, देहरादून इंटरनेशनल विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी फेस्टिवल के 7वें संस्करण और 21वें उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सम्मेलन शामिल रहे।
इन आयोजनों के जरिए प्रदेश में वैज्ञानिक सोच को प्रोत्साहित करने और विद्यार्थियों तथा युवाओं को नवाचार की दिशा में आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। विशेष रूप से सीमांत पर्वतीय क्षेत्रों में बच्चों को विज्ञान से जोड़ने वाली गतिविधियां ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों की प्रतिभाओं को सामने लाने का माध्यम बन सकती हैं।
बच्चों और युवाओं में वैज्ञानिक सोच विकसित करने पर बल
कार्यक्रम में विज्ञान को केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित रखने के बजाय उसे आम जीवन से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। विज्ञान एवं तकनीक के प्रति विद्यार्थियों में जिज्ञासा पैदा करने, प्रयोग आधारित सीखने को बढ़ावा देने और स्थानीय समस्याओं के समाधान के लिए नवाचार को प्रोत्साहित करने की दिशा में ऐसे आयोजनों की भूमिका महत्वपूर्ण बताई गई।
बागेश्वर में प्रस्तावित पंचम सीमांत पर्वतीय बाल विज्ञान महोत्सव को भी इसी दृष्टि से अहम माना जा रहा है। सीमांत क्षेत्रों के बच्चों को वैज्ञानिक गतिविधियों के लिए मंच उपलब्ध कराने से उनमें आत्मविश्वास बढ़ने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर मौजूद समस्याओं के वैज्ञानिक समाधान खोजने की सोच भी विकसित हो सकती है।
‘विज्ञान संप्रेषण’ पत्रिका का विमोचन
कार्यक्रम के दौरान ‘विज्ञान संप्रेषण’ पत्रिका का विमोचन भी किया गया। इसका उद्देश्य वैज्ञानिक विषयों, अनुसंधान और तकनीकी उपलब्धियों को आम लोगों तक सरल भाषा में पहुंचाने की दिशा में संवाद को मजबूत करना है। वैज्ञानिक जानकारी को सहज और जनसुलभ तरीके से प्रस्तुत करने से समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है।
वक्ताओं ने इस बात पर भी जोर दिया कि आज के दौर में जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाओं, जल संरक्षण और जैव विविधता जैसे विषयों को लेकर वैज्ञानिक समझ को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना आवश्यक है। इसके लिए विज्ञान संचार को अधिक प्रभावी और स्थानीय भाषाओं में व्यापक बनाने की जरूरत है।
विशेषज्ञों और गणमान्यजनों की रही मौजूदगी
कार्यक्रम में माननीय विधायक किशोर उपाध्याय जी, हेस्को के संस्थापक एवं पद्म पुरस्कार से सम्मानित डॉ. अनिल प्रकाश जोशी जी सहित विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े गणमान्यजन उपस्थित रहे। विशेषज्ञों और अतिथियों की मौजूदगी में हिमालयी पर्यावरण, विज्ञान, तकनीक और सतत विकास को लेकर विचारों का आदान-प्रदान हुआ।
कार्यक्रम का समग्र संदेश यही रहा कि हिमालय के संरक्षण की जिम्मेदारी केवल सरकार या किसी एक संस्था तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिक संस्थानों, स्थानीय समुदायों, युवाओं और आम नागरिकों की सक्रिय भागीदारी से ही हिमालय की प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखते हुए विकास की ऐसी राह तैयार की जा सकती है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित और टिकाऊ हो।
उत्तराखंड के संदर्भ में यह सोच इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रदेश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन का बड़ा हिस्सा प्रकृति और पर्वतीय संसाधनों से जुड़ा है। ऐसे में विकास की प्रत्येक पहल में पर्यावरणीय संतुलन को प्राथमिकता देना और स्थानीय हितों को साथ लेकर चलना ही हिमालयी क्षेत्र के दीर्घकालिक भविष्य की मजबूत नींव बन सकता है।

