देहरादून ; 31.08.2026,
देहरादून। उत्तराखंड में मदरसों और अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को मुख्यधारा की शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। इसी क्रम में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी आगामी 2 सितंबर को प्रदेश के 26 मदरसों समेत अन्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को मान्यता प्रमाण पत्र प्रदान करेंगे। कार्यक्रम को राज्य में अल्पसंख्यक संस्थानों की शिक्षा व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित और आधुनिक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के चेयरमैन डॉ. सुरजीत सिंह गांधी के अनुसार, प्राधिकरण में पंजीकृत और शिक्षा विभाग से आवश्यक मान्यता प्राप्त करने वाले संस्थानों को चरणबद्ध तरीके से प्रमाण पत्र दिए जा रहे हैं। इससे पहले 1 जुलाई 2026 को प्रक्रिया के शुरुआती चरण में मुख्यमंत्री ने सात मदरसों सहित कुल नौ अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को मान्यता प्रमाण पत्र सौंपे थे।
अब दूसरे चरण में 26 और मदरसों को मान्यता मिलने जा रही है। अधिकारियों के मुताबिक करीब 25 अन्य पंजीकृत मदरसों को भी अक्टूबर तक मान्यता प्रदान किए जाने की संभावना है। इसके अतिरिक्त प्रदेश के लगभग 200 मदरसों ने शिक्षा विभाग से मान्यता हासिल करने के लिए इन्वेस्ट पोर्टल के माध्यम से आवेदन किया है। इन आवेदनों की प्रक्रिया पूरी होने के बाद और संस्थानों को भी औपचारिक मान्यता मिलने का रास्ता साफ हो सकता है।
आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा देने पर फोकस
सरकार और अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का कहना है कि मदरसों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को भी ऐसी शिक्षा मिलनी चाहिए, जिससे वे आगे चलकर उच्च शिक्षा, रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं में दूसरे विद्यार्थियों के समान अवसर प्राप्त कर सकें। इसी सोच के तहत मदरसों को आधुनिक शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने, संस्थानों का पंजीकरण कराने और शैक्षणिक मानकों को व्यवस्थित करने पर जोर दिया जा रहा है।
प्राधिकरण और संबंधित विभागों की ओर से प्रदेश के अलग-अलग जिलों में जागरूकता कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं। इन कार्यक्रमों के जरिए संचालकों को मान्यता की प्रक्रिया, शिक्षा संबंधी मानकों और विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़े पहलुओं की जानकारी दी जा रही है।
संदिग्ध फंडिंग पर निगरानी का भी दावा
सरकार की ओर से यह भी कहा जा रहा है कि मदरसों को नियमन के दायरे में लाने से संस्थानों की गतिविधियों में पारदर्शिता बढ़ेगी। मान्यता और पंजीकरण की व्यवस्था के माध्यम से संस्थानों की शैक्षणिक गतिविधियों के साथ-साथ उनके संचालन और वित्तीय स्रोतों पर भी निगरानी रखने में मदद मिल सकती है।
सरकारी पक्ष का आरोप है कि कुछ लोग मदरसों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने की प्रक्रिया का विरोध कर रहे हैं। सरकार का मानना है कि शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और बच्चों को व्यापक शैक्षणिक अवसर उपलब्ध कराने के प्रयासों को किसी भी तरह की राजनीति से अलग रखा जाना चाहिए।
बिना मान्यता वाले संस्थानों पर उठ रहे सवाल
मान्यता प्रक्रिया के बीच उन मदरसों को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं, जो अभी तक निर्धारित प्रक्रिया के तहत शिक्षा विभाग से मान्यता प्राप्त नहीं कर पाए हैं। सबसे बड़ा प्रश्न ऐसे संस्थानों से जारी होने वाली मार्कशीट और शैक्षणिक प्रमाण पत्रों की वैधानिक मान्यता को लेकर है।
सरकार का रुख है कि यदि कोई संस्थान निर्धारित नियमों और मान्यता व्यवस्था के बाहर संचालित हो रहा है, तो वहां से जारी शैक्षणिक दस्तावेजों की स्वीकार्यता को लेकर विद्यार्थियों के सामने भविष्य में परेशानी पैदा हो सकती है। ऐसे में बच्चों के हित को ध्यान में रखते हुए संस्थानों को वैधानिक और नियामक व्यवस्था के भीतर लाने की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है।
हजारों विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ा मुद्दा
मदरसों की मान्यता का विषय केवल संस्थानों के प्रशासन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध वहां अध्ययन कर रहे विद्यार्थियों के भविष्य से भी जुड़ा है। मान्यता प्राप्त संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों को आगे की पढ़ाई और विभिन्न अवसरों में अपने शैक्षणिक दस्तावेजों की स्वीकार्यता को लेकर अपेक्षाकृत स्पष्ट स्थिति मिल सकती है।
उत्तराखंड सरकार इसी आधार पर मदरसों में धार्मिक शिक्षा के साथ आधुनिक विषयों और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अवसर बढ़ाने की बात कर रही है। सरकार का कहना है कि किसी भी बच्चे की शिक्षा ऐसी व्यवस्था में होनी चाहिए, जो उसे भविष्य में आगे बढ़ने के पर्याप्त विकल्प दे।
2 सितंबर को होने वाला प्रमाण पत्र वितरण इसी व्यापक प्रक्रिया की अगली कड़ी माना जा रहा है। आने वाले महीनों में आवेदन करने वाले अन्य मदरसों की जांच और मान्यता की प्रक्रिया पूरी होने के साथ प्रदेश में अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों की तस्वीर और अधिक स्पष्ट होने की उम्मीद है।

