देहरादून ; 27.08.2026,
देहरादून। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों से पैदा होने वाले संभावित खतरों को देखते हुए राज्य सरकार ने आपदा प्रबंधन की तैयारियों को और मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की लगातार वैज्ञानिक निगरानी के साथ प्रभावित क्षेत्रों में आधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम को मजबूत करने के निर्देश दिए हैं। जरूरत के अनुसार नए निगरानी और चेतावनी तंत्र स्थापित किए जाएंगे।
मुख्यमंत्री ने सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन को निर्देशित किया है कि प्रदेश की संवेदनशील ग्लेशियर झीलों का चरणबद्ध तरीके से विस्तृत सर्वेक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाए। इसके तहत झीलों के जलस्तर, क्षेत्रफल में बदलाव, आसपास के भू-भाग की स्थिति और संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों का नियमित आकलन किया जाएगा। इसका उद्देश्य किसी भी असामान्य बदलाव का समय रहते पता लगाकर संभावित आपदा के प्रभाव को कम करना है।
सरकार की तैयारी केवल चेतावनी प्रणाली लगाने तक सीमित नहीं रहेगी। संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षित निकासी मार्ग, संभावित प्रभावित इलाकों की पहचान, संचार व्यवस्था और स्थानीय स्तर पर त्वरित सूचना पहुंचाने की व्यवस्था को भी मजबूत किया जाएगा। साथ ही राहत एवं बचाव दलों की तैयारियों को प्रभावी बनाने पर भी जोर दिया गया है।
नेपाल की घटना के बाद जिलों की तैयारियों की समीक्षा
नेपाल में हाल में हुई आपदा के बाद उत्तराखंड में संभावित समान परिस्थितियों से निपटने की तैयारियों की समीक्षा की गई। मुख्यमंत्री के निर्देश पर राज्य सलाहकार समिति, आपदा प्रबंधन विभाग के उपाध्यक्ष विनय रुहेला और सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट कर्नल रघुवीर सिंह भंडारी ने प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों के साथ बैठक कर तैयारियों का जायजा लिया।
जिलाधिकारियों को अपने-अपने क्षेत्रों में जोखिम वाले स्थानों की नियमित निगरानी करने और किसी भी असामान्य गतिविधि की जानकारी तत्काल उच्च स्तर तक पहुंचाने के निर्देश दिए गए। अधिकारियों से स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए आपदा से पहले की तैयारियों को प्राथमिकता देने को कहा गया।
विनय रुहेला ने कहा कि उत्तराखंड और नेपाल के पर्वतीय इलाकों की भौगोलिक परिस्थितियों में कई समानताएं हैं। ऐसे में नेपाल की घटना से सीख लेकर राज्य में संभावित आपदाओं के प्रति पहले से तैयार रहना जरूरी है।
स्थानीय स्तर पर मजबूत होगा चेतावनी तंत्र
सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट कर्नल रघुवीर सिंह भंडारी ने कहा कि आपदा के दौरान स्थानीय प्रशासन और क्षेत्र में मौजूद लोगों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। उन्होंने ग्राम प्रधानों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों को आपदा संबंधी सूचना तेजी से उपलब्ध कराने के लिए प्रभावी संचार नेटवर्क विकसित करने की जरूरत बताई।
सरकार की योजना है कि आधुनिक सेंसर, जलस्तर मापक उपकरण और संचार तकनीक के माध्यम से झीलों में होने वाले बदलावों की जानकारी समय पर प्राप्त हो। इसके आधार पर संभावित प्रभावित क्षेत्रों में चेतावनी पहुंचाने की व्यवस्था को और प्रभावी बनाया जाएगा।
13 संवेदनशील ग्लेशियर झीलें चिन्हित
सचिव आपदा प्रबंधन ने बताया कि उत्तराखंड में कुल 13 ग्लेशियर झीलों को संवेदनशील श्रेणी में चिन्हित किया गया है। इनमें से चार झीलों का सर्वेक्षण पूरा हो चुका है, जबकि बाकी झीलों का अध्ययन चरणबद्ध तरीके से कराया जाएगा।
इसी क्रम में चमोली जिले की सरस्वती ताल और उत्तरकाशी जिले की केदारताल का सर्वेक्षण करने के लिए जल्द विशेषज्ञ दल भेजा जाएगा। विशेषज्ञ झीलों की मौजूदा स्थिति, जलस्तर, संभावित जोखिम के कारणों और डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव का अध्ययन करेंगे।
राज्य सरकार का जोर अब ग्लेशियर झीलों की निगरानी से आगे बढ़कर पूर्व चेतावनी, सुरक्षित निकासी और स्थानीय स्तर पर त्वरित प्रतिक्रिया की पूरी व्यवस्था तैयार करने पर है, ताकि किसी संभावित आपदा की स्थिति में जान-माल के नुकसान को न्यूनतम किया जा सके।
बैठक में एसीईओ प्रशासन प्रकाश चंद्र, एसीईओ क्रियान्वयन डीआईजी राजकुमार नेगी, जेसीईओ दिनेश कुमार पुनेठा समेत अन्य अधिकारी मौजूद रहे।

