17 june 2026
देहरादून। दशकों से लंबित किशाऊ बहुद्देश्यीय बांध परियोजना को आखिरकार नई गति मिलने की उम्मीद जग गई है। केंद्र सरकार द्वारा परियोजना के विद्युत घटक के लिए उत्तराखंड को विशेष वित्तीय सहायता देने पर सहमति बनने के बाद राज्य में इस महत्वाकांक्षी योजना के जल्द धरातल पर उतरने का रास्ता काफी हद तक साफ हो गया है। सरकार का मानना है कि परियोजना पूरी होने के बाद उत्तराखंड को लगभग 220 मेगावाट अतिरिक्त बिजली मिलेगी, जिससे बढ़ती ऊर्जा मांग को पूरा करने में बड़ी मदद मिलेगी।
हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित उच्चस्तरीय बैठक के दौरान केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में परियोजना से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई। बैठक में राज्यों के बीच लंबे समय से लंबित वित्तीय और प्रशासनिक मामलों को सुलझाने की दिशा में सहमति बनने के बाद परियोजना को आगे बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त हुआ। राज्य सरकार इसे उत्तराखंड के विकास और ऊर्जा सुरक्षा के लिए ऐतिहासिक कदम मान रही है।
करीब 15 हजार करोड़ रुपये की लागत वाली किशाऊ बहुद्देश्यीय परियोजना उत्तराखंड के देहरादून और हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के बीच टोंस नदी पर प्रस्तावित है। यह नदी यमुना की प्रमुख सहायक नदी मानी जाती है। परियोजना से कुल 442 मेगावाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश को 50-50 प्रतिशत हिस्सेदारी मिलेगी। इसके तहत दोनों राज्यों को लगभग 221-221 मेगावाट बिजली प्राप्त होगी।
विशेषज्ञों के अनुसार यह परियोजना केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि जल संरक्षण, सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण जैसे कई महत्वपूर्ण उद्देश्यों को भी पूरा करेगी। परियोजना से करीब 97 हजार हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा मिलने का अनुमान है। इससे उत्तराखंड और आसपास के राज्यों के किसानों को लंबे समय तक लाभ मिलेगा।
किशाऊ बांध को एशिया के सबसे ऊंचे बांधों में शामिल किया जा रहा है। इसकी प्रस्तावित ऊंचाई 235 मीटर है, जो टिहरी बांध के बाद क्षेत्र की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में गिनी जाएगी। परियोजना के तहत लगभग 32 किलोमीटर लंबी विशाल झील का निर्माण भी प्रस्तावित है, जो जल भंडारण क्षमता को काफी बढ़ाएगी।
परियोजना का इतिहास भी काफी पुराना है। इसकी अवधारणा वर्ष 1944-45 में सामने आई थी, जबकि पहली विस्तृत परियोजना रिपोर्ट 1965 में तैयार हुई। इसके बाद कई बार डीपीआर में संशोधन किए गए, लेकिन राज्यों के बीच सहमति और वित्तीय हिस्सेदारी को लेकर विवादों के कारण काम आगे नहीं बढ़ पाया। वर्ष 2015 में इसे राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा मिलने के बाद उम्मीदें जगी थीं, लेकिन विभिन्न कारणों से निर्माण प्रक्रिया फिर धीमी पड़ गई।
लंबे समय तक चले गतिरोध के कारण परियोजना की लागत में भी भारी बढ़ोतरी हुई। शुरुआती अनुमान लगभग 11,500 करोड़ रुपये का था, जो अब बढ़कर 15 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। विद्युत घटक के निर्माण पर लगभग 1,536 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। इसमें उत्तराखंड के हिस्से का बड़ा भाग केंद्र सरकार द्वारा 50 वर्षों की अवधि के लिए ब्याजमुक्त ऋण के रूप में उपलब्ध कराया जाएगा, जिससे राज्य के वित्तीय बोझ में कमी आएगी।
हालांकि परियोजना के साथ चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। बांध निर्माण से उत्तराखंड के नौ और हिमाचल प्रदेश के आठ गांव प्रभावित होंगे। लगभग छह हजार लोगों के विस्थापन की संभावना है। इसके अलावा हजारों हेक्टेयर भूमि जलाशय क्षेत्र में आएगी। ऐसे में पुनर्वास, मुआवजा और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना सरकारों के लिए बड़ी जिम्मेदारी होगी।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि परियोजना निर्धारित समयसीमा के भीतर पूरी हो जाती है तो उत्तराखंड को ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में नई पहचान मिलेगी। साथ ही प्रदेश को भविष्य में बिजली की बढ़ती मांग और संभावित ऊर्जा संकट से निपटने के लिए मजबूत आधार भी प्राप्त होगा। केंद्र और राज्यों के बीच बनी नई सहमति ने यह संकेत दे दिया है कि वर्षों से फाइलों में अटकी किशाऊ परियोजना अब वास्तव में जमीन पर आकार ले सकती है।

