देहरादून, 24 अगस्त 2026:
हिमालयी क्षेत्र में बदलती जलवायु का असर अब हिमाचल प्रदेश की ऊंची पहाड़ियों पर साफ दिखाई देने लगा है। ग्लेशियरों के पीछे हटने के साथ नई ग्लेशियल झीलें बन रही हैं और पहले से मौजूद झीलों का फैलाव भी बढ़ रहा है। ऐसे में इन झीलों के अचानक टूटने से होने वाली ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) का खतरा भी गंभीर होता जा रहा है।
एक हालिया अध्ययन के मुताबिक हिमाचल प्रदेश में ग्लेशियल झीलों की संख्या 1990 में 107 थी, जो 2024 तक बढ़कर 669 पहुंच गई। यानी तीन दशक से कुछ अधिक समय में इनकी संख्या में करीब 525 प्रतिशत का उछाल आया है। इसी अवधि में इन झीलों का कुल क्षेत्रफल 5.54 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 11.20 वर्ग किलोमीटर हो गया, जो लगभग 102 प्रतिशत की वृद्धि है।
छोटी झीलों की संख्या में सबसे तेज बदलाव
आंकड़ों का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वृद्धि केवल बड़ी झीलों तक सीमित नहीं है। 0.01 वर्ग किलोमीटर या उससे कम क्षेत्रफल वाली बेहद छोटी झीलों की संख्या 1990 में केवल 9 थी, जबकि 2024 में ऐसी झीलों की संख्या 487 दर्ज की गई। वैज्ञानिकों के लिए यह बदलाव इसलिए अहम है क्योंकि हिमनदों के पीछे हटने और नए जल-स्रोत बनने की प्रक्रिया लगातार जारी रहने का संकेत इससे मिलता है।
हिमाचल में ग्लेशियल झीलों की निगरानी के लिए रिमोट सेंसिंग और सैटेलाइट तकनीक पहले से इस्तेमाल हो रही है। 2025 में प्रकाशित एक अलग शोध में भी सैटेलाइट और मशीन-लर्निंग आधारित मैपिंग से ग्लेशियल झीलों में तेज बदलाव सामने आया था।
88 झीलों पर GLOF का खतरा
अध्ययन में 669 झीलों में से 94 को कम से कम 0.02 वर्ग किलोमीटर आकार वाली श्रेणी में रखा गया। इनमें 88 झीलों को संभावित GLOF ट्रिगर के प्रति संवेदनशील पाया गया। जोखिम का कारण केवल झील का आकार नहीं है, बल्कि उसके आसपास मौजूद प्राकृतिक परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण हैं।
विश्लेषण में 73 झीलों के पास अस्थिर प्राकृतिक बांध, 58 में भूकंपीय जोखिम, 52 में बर्फ की परत या आइस-कोर से जुड़ी संवेदनशीलता और 44 में चट्टानों के खिसकने जैसे संभावित कारण सामने आए हैं। जोखिम मूल्यांकन में 9 झीलों को बहुत अधिक, 18 को अधिक और 26 को मध्यम खतरे की श्रेणी में रखा गया।
खतरा केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं
GLOF की सबसे बड़ी चिंता यह है कि इसका प्रभाव झील के आसपास के इलाके से काफी दूर तक पहुंच सकता है। अचानक झील का पानी निकलने पर उसके साथ भारी मात्रा में मलबा, चट्टान और मिट्टी नीचे की ओर बह सकती है। इससे सड़कें, पुल, बस्तियां, जलविद्युत परियोजनाएं और बांध प्रभावित हो सकते हैं।
एक उपलब्ध अध्ययन के मॉडलिंग विश्लेषण में हिमाचल की दो उच्च-जोखिम वाली झीलों से संभावित बाढ़ के प्रभाव का आकलन किया गया था। इसमें कुछ परिस्थितियों में बहुत बड़े डिस्चार्ज की संभावना और downstream infrastructure पर गंभीर असर की बात सामने आई थी।
पश्चिमी हिमालय में बढ़ती गर्मी भी चिंता का कारण
ग्लेशियल झीलों का विस्तार व्यापक जलवायु परिवर्तन से भी जुड़ा हुआ है। हालिया जलवायु अध्ययन के अनुसार पश्चिमी हिमालय—जिसमें हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख शामिल हैं—सर्दियों में तेजी से गर्म हो रहा है। अध्ययन में 1901-1930 की तुलना में 2001-2020 के दौरान पश्चिमी हिमालय में सर्दियों के औसत तापमान में लगभग 1.06 डिग्री सेल्सियस वृद्धि दर्ज की गई।
तापमान बढ़ने का सीधा असर बर्फ और ग्लेशियरों की स्थिरता पर पड़ता है। बर्फ का तेजी से पिघलना और ग्लेशियरों का पीछे हटना कई स्थानों पर नए जलाशयों के बनने या मौजूदा झीलों के फैलने की परिस्थितियां तैयार कर सकता है।
अब निगरानी से आगे बढ़कर तैयारी की जरूरत
विशेषज्ञों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हर ग्लेशियल झील समान खतरा पैदा नहीं करती। इसलिए केवल झीलों की गिनती करना पर्याप्त नहीं होगा। जिन झीलों के नीचे आबादी, सड़कें, पुल, बांध या पावर प्रोजेक्ट हैं, उनकी प्राथमिकता के आधार पर लगातार निगरानी जरूरी है।
इसके लिए सैटेलाइट तस्वीरों के साथ जमीन पर सेंसर, जलस्तर की निगरानी, मौसम संबंधी आंकड़े और भूस्खलन-अवलांच की जानकारी को एक साथ इस्तेमाल किया जा सकता है। संभावित खतरे वाले क्षेत्रों में अर्ली वार्निंग सिस्टम, रियल-टाइम अलर्ट और स्थानीय प्रशासन से लेकर ग्रामीण आबादी तक स्पष्ट आपदा-प्रतिक्रिया व्यवस्था विकसित करना अहम होगा।
हिमाचल प्रदेश के लिए यह केवल पर्यावरणीय बदलाव का मुद्दा नहीं रह गया है। ग्लेशियल झीलों का बढ़ता आकार भविष्य में जल संसाधनों, आपदा प्रबंधन, पर्यटन, सड़क नेटवर्क और जलविद्युत ढांचे की सुरक्षा से सीधे जुड़ सकता है। इसलिए जोखिम वाली झीलों की पहचान के साथ-साथ उनके नीचे बसे क्षेत्रों के लिए पहले से निकासी मार्ग और चेतावनी तंत्र तैयार करना अब दीर्घकालिक सुरक्षा रणनीति का हिस्सा बनाना जरूरी दिखाई देता है।

