देहरादून ; 23.08.2026,
रामनगर। सरस मेले की दूसरी शाम सांस्कृतिक रंगों से सराबोर रही। पीएनजी महाविद्यालय के खेल मैदान में आयोजित कार्यक्रम में लोकगीतों और पहाड़ी धुनों ने ऐसा माहौल बनाया कि खरीदारी के लिए पहुंचे लोग भी सांस्कृतिक मंच के सामने रुककर कार्यक्रम का आनंद लेने लगे। शाम आगे बढ़ने के साथ दर्शकों की संख्या भी बढ़ती गई और पूरा परिसर तालियों व लोक संगीत की गूंज से जीवंत नजर आया।
कार्यक्रम में स्थानीय कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से शुरुआत की। इसके बाद लोक गायिका श्वेता माहरा ने मंच संभाला तो माहौल और अधिक रंगीन हो गया। उनकी प्रस्तुतियों में कुमाऊंनी और जौनसारी लोक संस्कृति की झलक देखने को मिली। पारंपरिक पहाड़ी धुनों पर आधारित गीतों ने दर्शकों को अपनी ओर खींचा और कई लोग गीतों की लय के साथ झूमते नजर आए।
श्वेता माहरा ने अपनी प्रस्तुति के दौरान पहाड़ की लोक परंपराओं और संगीत की विविधता को सामने रखा। उनके गीतों में स्थानीय बोली, पहाड़ी जीवन और पारंपरिक संगीत का प्रभाव साफ दिखाई दिया। मंच से उठती आवाज पूरे खेल मैदान में सुनाई देती रही, जिससे मेले में मौजूद लोगों का ध्यान सांस्कृतिक कार्यक्रम की ओर लगातार बना रहा।
शाम का आकर्षण उस समय और बढ़ गया, जब जौनसारी लोकधुन पर एसडीएम गोपाल सिंह चौहान भी कलाकारों के साथ कदम मिलाने के लिए मंच की ओर पहुंच गए। उन्होंने कलाकारों के साथ नृत्य किया तो दर्शकों ने तालियों के साथ उनका उत्साह बढ़ाया। अधिकारी का इस तरह सांस्कृतिक प्रस्तुति में शामिल होना कार्यक्रम में मौजूद लोगों के लिए भी खास अनुभव रहा।
सरस मेले में केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम ही आकर्षण का केंद्र नहीं हैं। ग्रामीण इलाकों से जुड़े महिला समूहों और अन्य स्थानीय समूहों की ओर से तैयार किए गए उत्पाद भी विभिन्न स्टॉलों पर प्रदर्शित किए जा रहे हैं। हस्तशिल्प, स्थानीय उपयोग की वस्तुओं और अन्य उत्पादों को देखने के साथ लोग उनकी खरीदारी भी कर रहे हैं। इससे स्थानीय स्तर पर काम कर रहे समूहों को अपने उत्पादों के लिए नए ग्राहक और व्यापक पहचान हासिल करने का अवसर मिल रहा है।
मेले की दूसरी शाम में सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और बाजार की गतिविधियों का अनोखा मेल देखने को मिला। स्टॉलों पर खरीदारी करने आए लोग संगीत सुनने के लिए कुछ देर मंच के पास ठहरते रहे और धीरे-धीरे वहां भीड़ जुटती गई। लोकगीतों की धुन, कलाकारों की प्रस्तुति और दर्शकों की भागीदारी ने पूरे आयोजन को उत्सव जैसा माहौल दे दिया।
सरस मेले की यह शाम इस बात की झलक भी दे गई कि स्थानीय लोक संगीत आज भी लोगों को सहज रूप से अपने साथ जोड़ लेता है। आधुनिक मनोरंजन के बीच पहाड़ी लोकधुनों के प्रति दर्शकों का उत्साह यह बताता है कि कुमाऊं और जौनसार की सांस्कृतिक विरासत को मंच मिलने पर लोग उसे पूरे मन से स्वीकार करते हैं। मेले के दूसरे दिन का आयोजन इसी सांस्कृतिक जुड़ाव और ग्रामीण प्रतिभाओं को प्रोत्साहन देने की दिशा में खास साबित हुआ।

