देहरादून ; 3.10.2026,
मां दुर्गा की भक्ति, शक्ति और आस्था से जुड़ा नवरात्रि का पर्व हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में शामिल है। साल में चार नवरात्रि आती हैं, लेकिन चैत्र और शारदीय नवरात्रि का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। इनमें शारदीय नवरात्रि को विशेष रूप से मां दुर्गा की आराधना, व्रत और शक्ति साधना का पर्व माना जाता है। ‘नवरात्रि’ दो शब्दों से मिलकर बना है—‘नव’ यानी नौ और ‘रात्रि’ यानी रात। इन नौ रातों में देवी के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है और दसवें दिन विजयादशमी के साथ इस पर्व का समापन होता है।
आखिर क्यों मनाई जाती है नवरात्रि?
नवरात्रि के पीछे कई धार्मिक और पौराणिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। सबसे प्रमुख कथा मां दुर्गा और महिषासुर के युद्ध की है। पौराणिक मान्यता के अनुसार महिषासुर ने कठोर तपस्या के बाद वरदान प्राप्त किया और अपनी शक्ति के अहंकार में देवताओं तथा पृथ्वी पर अत्याचार करने लगा।
जब महिषासुर का आतंक बढ़ा तो देवताओं की शक्तियों से देवी दुर्गा का प्राकट्य हुआ। देवी को विभिन्न देवताओं से दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्राप्त हुए और वह सिंह पर सवार होकर महिषासुर से युद्ध करने पहुंचीं। धार्मिक मान्यता के अनुसार देवी और महिषासुर के बीच नौ दिनों तक युद्ध हुआ और दसवें दिन मां दुर्गा ने उसका वध कर दिया।
इसी पौराणिक प्रसंग को अच्छाई की बुराई पर और धर्म की अधर्म पर विजय का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि नवरात्रि के नौ दिन देवी शक्ति की उपासना के लिए समर्पित रहते हैं और इसके बाद विजयादशमी मनाई जाती है।
2026 में कब से शुरू होगी शारदीय नवरात्रि?
साल 2026 में शारदीय नवरात्रि की शुरुआत 11 अक्टूबर, रविवार से होगी। इसी दिन घटस्थापना के साथ नवरात्रि का शुभारंभ होगा। पंचांग के अनुसार 19 अक्टूबर को दुर्गा अष्टमी और महानवमी से जुड़े प्रमुख अनुष्ठान होंगे, जबकि 20 अक्टूबर को विजयादशमी मनाई जाएगी।
2026 की नवरात्रि की प्रमुख तिथियां
- 11 अक्टूबर – प्रतिपदा, घटस्थापना और मां शैलपुत्री की पूजा
- 12 अक्टूबर – द्वितीया, मां ब्रह्मचारिणी की पूजा
- 13 अक्टूबर – तृतीया, मां चंद्रघंटा की पूजा
- 14 अक्टूबर – चतुर्थी, मां कूष्मांडा की पूजा
- 15 अक्टूबर – पंचमी, मां स्कंदमाता की पूजा
- 16 अक्टूबर – षष्ठी, मां कात्यायनी की पूजा
- 17 अक्टूबर – सप्तमी, मां कालरात्रि की पूजा
- 18 अक्टूबर – अष्टमी से जुड़े अनुष्ठान
- 19 अक्टूबर – दुर्गा अष्टमी/महानवमी के प्रमुख अनुष्ठान और मां महागौरी की पूजा
- 20 अक्टूबर – नवमी हवन, नवरात्रि पारण और विजयादशमी
तिथियों के स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा के समय में अंतर हो सकता है। उदाहरण के लिए दिल्ली के लिए 11 अक्टूबर को घटस्थापना का समय सुबह 6:19 से 10:12 बजे तक बताया गया है।
नौ दिनों में क्यों होती है मां के नौ रूपों की पूजा?
नवरात्रि की सबसे खास धार्मिक परंपरा नवदुर्गा की आराधना है। मान्यता है कि मां दुर्गा के ये नौ स्वरूप देवी शक्ति के अलग-अलग रूपों और गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं। हर दिन देवी के एक स्वरूप की पूजा की जाती है।
1. मां शैलपुत्री
नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा होती है। ‘शैल’ का अर्थ पर्वत और ‘पुत्री’ का अर्थ बेटी है। धार्मिक मान्यता के अनुसार मां शैलपुत्री पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं। उन्हें माता पार्वती का स्वरूप माना जाता है। मां शैलपुत्री की पूजा से नवरात्रि की साधना का शुभारंभ होता है।
2. मां ब्रह्मचारिणी
दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की आराधना की जाती है। यह स्वरूप तप, साधना और त्याग का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। इसलिए मां ब्रह्मचारिणी को धैर्य और तपस्या की देवी के रूप में पूजा जाता है।
3. मां चंद्रघंटा
तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा होती है। उनके मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित होने के कारण उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। धार्मिक मान्यता में उनका स्वरूप शांति और साहस दोनों का प्रतीक माना जाता है। भक्त मां से भय और नकारात्मकता से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं।
4. मां कूष्मांडा
चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा की जाती है। धार्मिक परंपरा में उन्हें सृष्टि की आदि शक्ति के रूप में देखा जाता है। मान्यता है कि उनकी दिव्य मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना हुई। इसी वजह से मां कूष्मांडा को सृजन और ऊर्जा से जोड़कर देखा जाता है।
5. मां स्कंदमाता
पांचवें दिन मां स्कंदमाता की आराधना होती है। उन्हें भगवान कार्तिकेय यानी स्कंद की माता माना जाता है। मां का यह स्वरूप मातृत्व, करुणा और वात्सल्य का प्रतीक माना जाता है। भक्त परिवार और संतान के सुख के लिए मां की पूजा करते हैं।
6. मां कात्यायनी
छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता में मां कात्यायनी को देवी के शक्तिशाली योद्धा स्वरूप से जोड़ा जाता है। महिषासुर के विरुद्ध देवी शक्ति के युद्ध की कथा में कात्यायनी स्वरूप का विशेष उल्लेख मिलता है। भक्त उनसे साहस और शक्ति की कामना करते हैं।
7. मां कालरात्रि
सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा होती है। नाम भले ही उग्र हो, लेकिन धार्मिक मान्यता में मां कालरात्रि अपने भक्तों के भय को दूर करने वाली देवी मानी जाती हैं। उन्हें नकारात्मक शक्तियों के विनाश और निर्भयता का प्रतीक माना जाता है।
8. मां महागौरी
आठवें दिन मां महागौरी की आराधना की जाती है। मां का यह स्वरूप शांति, पवित्रता और सौम्यता से जुड़ा माना जाता है। महाष्टमी के दिन देशभर में देवी मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है और कई परिवारों में कन्या पूजन भी किया जाता है।
9. मां सिद्धिदात्री
नवरात्रि के नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा होती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार मां सिद्धिदात्री अपने भक्तों को सिद्धियां और मनोवांछित फल प्रदान करने वाली देवी हैं। नवमी के दिन पूजा, हवन और कन्या पूजन के साथ कई परिवार नवरात्रि की साधना का समापन करते हैं।
घटस्थापना से शुरू होती है नौ दिनों की साधना
नवरात्रि के पहले दिन घरों और मंदिरों में कलश स्थापना या घटस्थापना की जाती है। कलश को शुभता, समृद्धि और देवी शक्ति का प्रतीक माना जाता है। इसके साथ जौ बोने की परंपरा भी कई घरों में निभाई जाती है।
कई श्रद्धालु नौ दिनों तक अखंड ज्योत जलाते हैं। सुबह-शाम मां दुर्गा की आरती की जाती है। दुर्गा सप्तशती का पाठ, देवी मंत्रों का जाप और भजन-कीर्तन भी नवरात्रि की धार्मिक परंपराओं का हिस्सा हैं।
व्रत रखने के पीछे क्या है धार्मिक महत्व?
नवरात्रि के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु व्रत रखते हैं। कोई पूरे नौ दिनों तक उपवास करता है तो कोई फलाहार या सात्विक भोजन ग्रहण करता है। धार्मिक दृष्टि से व्रत को सिर्फ भोजन से परहेज नहीं माना जाता, बल्कि यह मन, वाणी और इंद्रियों पर संयम रखने की साधना भी है।
मान्यता है कि जब व्यक्ति अपनी दैनिक व्यस्तताओं से कुछ समय निकालकर पूजा, ध्यान और भक्ति में मन लगाता है तो उसे आत्मचिंतन का अवसर मिलता है। यही कारण है कि नवरात्रि को बाहरी उत्सव के साथ-साथ आध्यात्मिक साधना का समय भी माना जाता है।
अष्टमी और नवमी पर कन्या पूजन का विशेष महत्व
नवरात्रि के अंतिम दिनों में कन्या पूजन की परंपरा विशेष रूप से देखने को मिलती है। छोटी कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर उनके चरण धोए जाते हैं, उन्हें भोजन कराया जाता है और श्रद्धानुसार उपहार व दक्षिणा दी जाती है।
कई परिवार अष्टमी को कन्या पूजन करते हैं तो कई नवमी के दिन। कुछ लोग दोनों दिनों में भी यह धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। इसके पीछे यह भाव है कि नारी शक्ति स्वयं देवी शक्ति का स्वरूप है।
नवरात्रि में हर जगह दिखता है भक्ति का अलग रंग
नवरात्रि की खूबसूरती सिर्फ धार्मिक अनुष्ठानों में नहीं, बल्कि इसकी विविध सांस्कृतिक परंपराओं में भी दिखाई देती है। गुजरात में गरबा और डांडिया के माध्यम से मां की आराधना की जाती है। पश्चिम बंगाल में भव्य दुर्गा पूजा आयोजित होती है। उत्तर भारत में नवरात्रि के साथ रामलीला और दशहरा की परंपरा जुड़ती है। दक्षिण भारत में भी देवी आराधना और पारंपरिक धार्मिक आयोजनों का विशेष महत्व है।
यानी एक ही पर्व देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग रंग, अलग परंपरा और अलग अंदाज में दिखाई देता है, लेकिन आस्था का केंद्र मां शक्ति ही रहती हैं।
नवरात्रि का संदेश सिर्फ पूजा तक सीमित नहीं
नवरात्रि की धार्मिक कथाओं में देवी की विजय को मनुष्य के भीतर मौजूद नकारात्मक शक्तियों पर विजय के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है। महिषासुर केवल एक पौराणिक पात्र नहीं, बल्कि धार्मिक व्याख्या में अहंकार और अधर्म का प्रतीक भी माना जाता है।
इसीलिए नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा की आराधना करते हुए श्रद्धालु अपने जीवन से अहंकार, क्रोध, भय और नकारात्मक विचारों को दूर करने का संकल्प लेते हैं। नौ दिनों की साधना के बाद विजयादशमी का आना इस संदेश को और मजबूत करता है कि धर्म और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा हमेशा जीवन में बनी रहनी चाहिए।
इस तरह नवरात्रि सिर्फ नौ रातों का त्योहार नहीं, बल्कि शक्ति की उपासना, आत्मसंयम, भक्ति और धर्म की विजय का पर्व है। मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना के साथ भक्त यही कामना करते हैं कि जगदंबा की कृपा से घर-परिवार में सुख-शांति बनी रहे और जीवन में शक्ति, सद्बुद्धि और सकारात्मकता का संचार हो।

