16 june 2026
नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने आउटसोर्स और संविदा कर्मचारियों की सेवा स्थिति को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि केवल लंबे समय तक कार्यरत रहने से किसी कर्मचारी को नियमित सरकारी कर्मचारी जैसी कानूनी स्थिति प्राप्त नहीं हो जाती। अदालत ने कहा कि आउटसोर्स एजेंसी के माध्यम से नियुक्त कर्मचारियों और राज्य सरकार के बीच प्रत्यक्ष नियोक्ता-कर्मचारी संबंध नहीं माना जा सकता।
जस्टिस मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ ने यह फैसला उन दो कर्मचारियों की याचिका पर सुनाया, जो उत्तराखंड पूर्व सैनिक कल्याण निगम (UPNL) के माध्यम से उत्तराखंड जल संस्थान में स्टेनोग्राफर के रूप में कार्यरत थे। अदालत ने उनकी याचिका खारिज करते हुए जल संस्थान द्वारा जारी आदेश को वैध ठहराया।
पदनाम परिवर्तन को लेकर शुरू हुआ विवाद
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ताओं को UPNL के माध्यम से स्टेनोग्राफर पद पर नियुक्त किया गया था। वर्ष 2021 में तत्कालीन मुख्य महाप्रबंधक ने एक प्रशासनिक आदेश जारी कर उनका पदनाम बदलकर “वरिष्ठ निजी सहायक” कर दिया था।
इसके बाद वर्ष 2026 में उत्तराखंड जल संस्थान ने एक नया आदेश जारी करते हुए दोनों कर्मचारियों का पदनाम पुनः स्टेनोग्राफर कर दिया। इस आदेश को चुनौती देते हुए कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
याचिकाकर्ताओं ने रखा यह तर्क
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि जब विभाग ने एक बार उनका पदनाम वरिष्ठ निजी सहायक कर दिया था, तब उन्हें उसी पद पर कार्य करने का अधिकार प्राप्त हो गया। उनका तर्क था कि बिना किसी उचित कारण के उनके पदनाम को वापस बदलना अनुचित और मनमाना निर्णय है।
जल संस्थान ने अदालत में क्या कहा
उत्तराखंड जल संस्थान की ओर से अदालत को बताया गया कि दोनों कर्मचारी आउटसोर्स श्रेणी में आते हैं और उन्हें UPNL द्वारा केवल स्टेनोग्राफर पद के लिए ही उपलब्ध कराया गया था। संस्थान ने दलील दी कि आउटसोर्स कर्मचारियों को पदोन्नति देने या उन्हें किसी उच्च पद का दर्जा प्रदान करने का अधिकार विभाग के पास नहीं है।
संस्थान ने यह भी कहा कि तत्कालीन मुख्य महाप्रबंधक द्वारा किया गया पदनाम परिवर्तन नियमों और अधिकार क्षेत्र के अनुरूप नहीं था।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के आदेशों, सेवा नियमों और उपलब्ध अभिलेखों का परीक्षण किया। अदालत ने कहा कि आउटसोर्स कर्मचारियों को पदोन्नति या उच्च पद का दावा करने का कोई वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि मुख्य महाप्रबंधक द्वारा किया गया पदनाम परिवर्तन कानूनी अधिकार के अभाव में किया गया था। इसलिए सक्षम प्राधिकारी द्वारा उसे निरस्त कर मूल स्थिति बहाल करना पूरी तरह उचित और नियमसम्मत है।
प्रत्यक्ष सेवा संबंध नहीं माना जा सकता
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आउटसोर्स कर्मचारियों की नियुक्ति किसी एजेंसी के माध्यम से होती है। ऐसे कर्मचारियों का संबंधित सरकारी विभाग के साथ प्रत्यक्ष सेवा संबंध स्थापित नहीं होता। इसी कारण उन्हें नियमित कर्मचारियों की तरह पदोन्नति, वरिष्ठता या उच्च पद का लाभ नहीं दिया जा सकता।
भविष्य के लाभों पर नहीं पड़ेगा असर
हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि यदि भविष्य में राज्य सरकार आउटसोर्स या संविदा कर्मचारियों के हित में कोई नीति लागू करती है, तो याचिकाकर्ता उस नीति के तहत मिलने वाले लाभ प्राप्त करने के लिए पात्र हो सकते हैं। वर्तमान आदेश का उन संभावित लाभों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
याचिका खारिज, विभागीय आदेश बरकरार
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं का दावा अस्वीकार कर दिया और उत्तराखंड जल संस्थान द्वारा जारी पदनाम बहाली के आदेश को वैध ठहराते हुए याचिका खारिज कर दी।
यह फैसला राज्य के हजारों आउटसोर्स और संविदा कर्मचारियों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी दृष्टांत माना जा रहा है, क्योंकि अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि आउटसोर्स व्यवस्था के तहत कार्यरत कर्मचारियों को नियमित सरकारी कर्मचारियों के समान सेवा अधिकार स्वतः प्राप्त नहीं होते।

