देहरादून ; 09.10.2026,
पितृ पक्ष का समापन शनिवार, 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा। हिंदू धर्म में इस तिथि को पितरों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और स्मरण व्यक्त करने का विशेष अवसर माना जाता है। इसे सर्वपितृ अमावस्या और महालय अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन उन पूर्वजों का श्राद्ध और तर्पण करने की परंपरा है, जिनकी मृत्यु की तिथि परिवार को याद नहीं है या किसी कारणवश जिनका श्राद्ध पितृ पक्ष के दौरान नहीं हो पाया।
पितृ पक्ष के अंतिम दिन होने के कारण इस अमावस्या का धार्मिक महत्व काफी अधिक माना जाता है। मान्यता है कि विधि-विधान से श्राद्ध, तर्पण और दान करने से पितरों के प्रति सम्मान प्रकट होता है। कई परिवार इस अवसर पर अपने पूर्वजों को याद करते हैं और उनकी स्मृति में जरूरतमंदों को भोजन कराते हैं।
सर्वपितृ अमावस्या 2026: कब से कब तक रहेगी अमावस्या तिथि?
पंचांग के अनुसार, अमावस्या तिथि शुक्रवार, 9 अक्टूबर की रात से शुरू होकर शनिवार, 10 अक्टूबर की रात तक रहेगी। उदय तिथि और श्राद्ध परंपरा के अनुसार 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या मनाई जाएगी।
अमावस्या तिथि और श्राद्ध का समय
- अमावस्या तिथि प्रारंभ: 9 अक्टूबर 2026, रात 9:35 बजे
- अमावस्या तिथि समाप्त: 10 अक्टूबर 2026, रात 9:19 बजे
- दिन: शनिवार, 10 अक्टूबर 2026
- कुतुप मुहूर्त: सुबह लगभग 11:44 से दोपहर 12:31 बजे तक
श्राद्ध के मुहूर्त में स्थान के अनुसार कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है। इसलिए अपने शहर के स्थानीय पंचांग से समय की पुष्टि करना उचित रहेगा।
क्यों खास मानी जाती है सर्वपितृ अमावस्या?
पितृ पक्ष में प्रत्येक तिथि पर परिवार के उन सदस्यों का श्राद्ध किया जाता है, जिनका देहांत संबंधित तिथि को हुआ हो। लेकिन कई बार परिवार को मृत्यु की सही तिथि मालूम नहीं होती। ऐसी स्थिति में सर्वपितृ अमावस्या को सभी ज्ञात और अज्ञात पितरों के निमित्त श्राद्ध करने की परंपरा है।
यदि किसी कारण से पितृ पक्ष की निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं हो पाया हो, तो भी इस दिन पूर्वजों के लिए तर्पण और श्राद्ध किया जा सकता है। इसी व्यापक महत्व के कारण इसे सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है।
महालय अमावस्या के रूप में भी इस दिन को विशेष स्थान प्राप्त है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह पितृ पक्ष के समापन और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा अर्पित करने का अवसर है। अलग-अलग क्षेत्रों में इससे जुड़ी परंपराओं और अनुष्ठानों में अंतर देखने को मिलता है।
सर्वपितृ अमावस्या पर कैसे करें श्राद्ध और तर्पण?
इस दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करने के बाद पितरों का स्मरण किया जाता है। परिवार की परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार श्राद्ध कर्म किया जा सकता है।
- पितरों का स्मरण: सबसे पहले अपने पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद करें और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें।
- तर्पण: धार्मिक परंपरा के अनुसार जल, काले तिल, कुश और पुष्प का उपयोग करके पितरों के निमित्त तर्पण किया जाता है।
- श्राद्ध कर्म: परिवार की परंपरा के अनुसार पिंडदान और अन्य श्राद्ध संबंधी अनुष्ठान किए जा सकते हैं।
- भोजन और दान: जरूरतमंदों को भोजन कराना, अन्न-वस्त्र का दान करना और सामर्थ्य के अनुसार सेवा करना शुभ माना जाता है।
- प्रार्थना: अंत में पूर्वजों का स्मरण करते हुए परिवार की सुख-शांति और कल्याण की कामना की जाती है।
श्राद्ध की विधि परिवार की परंपरा, क्षेत्र और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। विस्तृत कर्मकांड के लिए पुरोहित से परामर्श लिया जा सकता है।
पितरों के नाम पर दान का भी है महत्व
सर्वपितृ अमावस्या पर केवल कर्मकांड ही नहीं, बल्कि सेवा और दान को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन जरूरतमंद लोगों को भोजन कराना, अनाज देना और अपनी क्षमता के अनुसार सहायता करना कई परिवारों की परंपरा का हिस्सा है।
कुछ परिवार पितरों की स्मृति में गाय, कुत्ते और पक्षियों के लिए भोजन भी रखते हैं। इन परंपराओं का उद्देश्य जीवों के प्रति दया, सेवा और पूर्वजों के प्रति सम्मान की भावना को बनाए रखना है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन किया गया दान और सेवा पितरों के निमित्त पुण्य कार्य माना जाता है। हालांकि, इन अनुष्ठानों को अपनी श्रद्धा, सामर्थ्य और पारिवारिक परंपरा के अनुसार करना चाहिए।
पितृ पक्ष के समापन के साथ शुरू होगा त्योहारों का नया दौर
सर्वपितृ अमावस्या के साथ पितृ पक्ष का समापन हो जाएगा। इसके बाद शारदीय नवरात्र और दशहरा जैसे प्रमुख त्योहारों की तैयारियां धार्मिक कैलेंडर के अनुसार आगे बढ़ेंगी। महालय अमावस्या का सांस्कृतिक महत्व भी कई क्षेत्रों में विशेष है, जहां इसे आगामी दुर्गा पूजा उत्सव से जोड़कर देखा जाता है।
इस प्रकार 10 अक्टूबर की सर्वपितृ अमावस्या पूर्वजों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने, परिवार की परंपराओं को निभाने और सेवा-दान के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं को मजबूत करने का अवसर होगी।
ध्यान दें: श्राद्ध कर्म के लिए कुतुप मुहूर्त को प्रमुख माना जाता है। अपने क्षेत्र के पंचांग के अनुसार समय की पुष्टि करके ही अनुष्ठान करें।

