देहरादून ; 24.09.2026।
हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। यह अवधि पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, स्मरण और कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए समर्पित मानी जाती है। इस दौरान लोग अपने दिवंगत पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और दान-पुण्य जैसे धार्मिक कार्य करते हैं।
वर्ष 2026 में पितृ पक्ष की शुरुआत 26 सितंबर से होगी और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ इसका समापन होगा। पितृ पक्ष को सामान्य तौर पर श्राद्ध पक्ष भी कहा जाता है। इस अवधि में परिवार अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध कर्म करते हैं।
कब से कब तक रहेगा पितृ पक्ष?
पंचांग के अनुसार 2026 में पितृ पक्ष की अवधि लगभग 15 दिनों की रहेगी। इसकी शुरुआत पूर्णिमा श्राद्ध से होगी और अंतिम दिन सर्वपितृ अमावस्या मनाई जाएगी।
- 26 सितंबर 2026 — पूर्णिमा श्राद्ध
- 27 सितंबर — प्रतिपदा श्राद्ध
- 28 सितंबर — द्वितीया श्राद्ध
- 29 सितंबर — तृतीया श्राद्ध
- 30 सितंबर — चतुर्थी/पंचमी श्राद्ध
- 1 अक्टूबर — षष्ठी श्राद्ध
- 2 अक्टूबर — सप्तमी श्राद्ध
- 3 अक्टूबर — अष्टमी श्राद्ध
- 4 अक्टूबर — नवमी श्राद्ध
- 5 अक्टूबर — दशमी श्राद्ध
- 6 अक्टूबर — एकादशी श्राद्ध
- 7 अक्टूबर — द्वादशी श्राद्ध
- 8 अक्टूबर — त्रयोदशी श्राद्ध
- 9 अक्टूबर — चतुर्दशी श्राद्ध
- 10 अक्टूबर — सर्वपितृ अमावस्या
पूर्वजों को याद करने का विशेष समय
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृ पक्ष में अपने पूर्वजों का स्मरण करने और उनके निमित्त धार्मिक कर्म करने से परिवार में पितरों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की भावना प्रकट होती है। श्राद्ध में ‘श्रद्धा’ को विशेष महत्व दिया गया है। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक किए गए कर्मों से पितरों की तृप्ति होती है और उनका आशीर्वाद परिवार को प्राप्त होता है।
इसी कारण पितृ पक्ष के दौरान लोग अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध करते हैं। यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती है, तो धार्मिक परंपराओं में उसके लिए सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध करने की मान्यता है।
श्राद्ध और तर्पण का क्या है महत्व?
पितृ पक्ष में किए जाने वाले प्रमुख धार्मिक कर्मों में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान शामिल हैं। तर्पण में जल अर्पित कर पितरों का स्मरण किया जाता है, जबकि पिंडदान को भी कई हिंदू परंपराओं में महत्वपूर्ण माना गया है।
श्राद्ध कर्म के दौरान पूर्वजों को याद करते हुए भोजन, जल और अन्य सामग्री अर्पित करने तथा जरूरतमंदों को दान देने की परंपरा भी विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित है। कई परिवार इस अवसर पर ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान-पुण्य करते हैं।
कौए और अन्य जीवों को भोजन कराने की परंपरा
पितृ पक्ष से जुड़ी धार्मिक परंपराओं में कौए को भोजन कराने का भी विशेष उल्लेख मिलता है। हिंदू मान्यताओं में कौए को पितरों का प्रतीक माना गया है। इसके अलावा कई स्थानों पर गाय, कुत्ते और अन्य जीवों को भी भोजन कराने की परंपरा है।
इन परंपराओं के पीछे मुख्य भाव पूर्वजों का स्मरण, जीवों के प्रति करुणा और दान-पुण्य करना माना जाता है।
सर्वपितृ अमावस्या क्यों है खास?
पितृ पक्ष का अंतिम दिन सर्वपितृ अमावस्या कहलाता है। यह दिन उन सभी पितरों के लिए श्राद्ध करने का अवसर माना जाता है, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है या जिनका श्राद्ध किसी कारण से निर्धारित तिथि पर नहीं हो पाया हो।
2026 में सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को होगी। इसके साथ ही पितृ पक्ष का समापन माना जाएगा।
पितृ पक्ष में किन बातों का रखा जाता है ध्यान?
धार्मिक परंपराओं के अनुसार इस दौरान लोग सात्विक जीवनशैली अपनाने, जरूरतमंदों की सहायता करने और दान-पुण्य करने पर जोर देते हैं। कई परिवार इस अवधि में अपने घर-परिवार में शांति और सद्भाव बनाए रखने तथा पूर्वजों का श्रद्धापूर्वक स्मरण करने को महत्वपूर्ण मानते हैं।
हालांकि, पितृ पक्ष से जुड़ी पूजा-विधि और मान्यताओं में क्षेत्र, परिवार और पंचांग के अनुसार अंतर हो सकता है। इसलिए किसी विशेष श्राद्ध की तिथि और विधि के लिए स्थानीय पंचांग या विद्वान पुरोहित से सलाह लेना उचित माना जाता है।
निष्कर्ष
पितृ पक्ष केवल श्राद्ध कर्म की अवधि ही नहीं, बल्कि हिंदू परंपरा में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, स्मरण और कृतज्ञता व्यक्त करने का समय भी माना जाता है। वर्ष 2026 में 26 सितंबर से शुरू होने वाला पितृ पक्ष 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होगा। इस दौरान देशभर में लोग अपनी पारिवारिक परंपराओं के अनुसार पितरों का तर्पण, श्राद्ध और दान-पुण्य करेंगे।

