देहरादून ; 3.10.2026,
भारत के स्वदेशी एयरो-इंजन कार्यक्रम को बड़ी सफलता मिली है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट (GTRE) द्वारा विकसित कावेरी ड्राई इंजन ने रूस में हाई-एल्टीट्यूड और फ्लाइट ट्रायल सफलतापूर्वक पूरे किए हैं। परीक्षण के दौरान इंजन ने 48.5 किलो न्यूटन (kN) का पीक ड्राई थ्रस्ट हासिल किया, जबकि इसके लिए करीब 46 kN का लक्ष्य निर्धारित किया गया था।
भारत के लिए क्यों अहम है यह उपलब्धि?
कावेरी इंजन की यह सफलता सिर्फ एक इंजन के परीक्षण तक सीमित नहीं है। यह भारत में अत्याधुनिक एयरो-इंजन तकनीक विकसित करने की लंबे समय से चली आ रही कोशिश का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
कावेरी कार्यक्रम की शुरुआत मूल रूप से LCA तेजस के लिए स्वदेशी इंजन विकसित करने के उद्देश्य से हुई थी। हालांकि मूल इंजन तेजस की आवश्यकताओं के अनुरूप पर्याप्त थ्रस्ट हासिल नहीं कर सका, लेकिन इस कार्यक्रम से भारत ने गैस टर्बाइन, कंप्रेसर, टर्बाइन, कम्बशन सिस्टम, इंजन कंट्रोल और हाई-टेम्परेचर मटेरियल जैसी महत्वपूर्ण तकनीकों में अनुभव हासिल किया।
रूस में हुई कठिन परिस्थितियों में टेस्टिंग
कावेरी डेरिवेटिव इंजन को रूस में अलग-अलग परिस्थितियों में परखा गया। हाई-एल्टीट्यूड परीक्षणों के दौरान इंजन को कम वायुदाब और कम तापमान जैसी परिस्थितियों में जांचा गया। इसके बाद इसे वास्तविक उड़ान परिस्थितियों में भी टेस्ट किया गया।
फ्लाइट ट्रायल के लिए एक संशोधित Il-76 फ्लाइंग टेस्टबेड का इस्तेमाल किया गया। इस दौरान इंजन को अलग-अलग दबाव, गति और थ्रस्ट की परिस्थितियों में चलाकर उसके प्रदर्शन का आकलन किया गया।
48.5 kN थ्रस्ट ने बढ़ाई उम्मीद
कावेरी ड्राई इंजन के लिए लगभग 46 kN थ्रस्ट का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन परीक्षण में इसने 48.5 kN का आंकड़ा हासिल किया। हालांकि यह उपलब्धि महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इंजन तुरंत ऑपरेशनल इस्तेमाल के लिए तैयार हो गया है।
अब भारत में इसके टेस्ट डेटा का मूल्यांकन और एयरवर्थिनेस सर्टिफिकेशन किया जाना है। इसके बाद संबंधित प्लेटफॉर्म के साथ इंजन का इंटीग्रेशन और आगे के परीक्षण होंगे।
‘घातक’ UCAV के लिए तैयार हो रहा स्वदेशी इंजन
कावेरी ड्राई इंजन को भारत के प्रस्तावित ‘घातक’ स्टील्थ Unmanned Combat Aerial Vehicle (UCAV) के लिए इस्तेमाल किए जाने की दिशा में विकसित किया जा रहा है।
यदि आगे के प्रमाणन और इंटीग्रेशन चरण सफल रहते हैं, तो भारत को एक ऐसा स्वदेशी पावरप्लांट मिल सकता है जिसे भविष्य के मानवरहित लड़ाकू प्लेटफॉर्म में इस्तेमाल किया जा सके। इससे भारत की स्वदेशी रक्षा तकनीक और सैन्य विमानन क्षेत्र में घरेलू क्षमता को बढ़ावा मिल सकता है।
दशकों पुराने प्रोजेक्ट को मिली नई दिशा
कावेरी इंजन की कहानी कई दशक पुरानी है। तेजस के लिए अपेक्षित प्रदर्शन हासिल न कर पाने के बावजूद इस परियोजना से मिली तकनीकी विशेषज्ञता को आगे के विकास में इस्तेमाल किया गया। अब इसका ड्राई डेरिवेटिव एक अलग भूमिका के लिए तैयार किया जा रहा है।
रूस में हुए हालिया परीक्षण इस लंबे सफर में एक और महत्वपूर्ण चरण हैं। अगले चरण में भारत के लिए सबसे अहम काम इंजन का प्रमाणन, प्लेटफॉर्म के साथ एकीकरण और आगे के उड़ान परीक्षण होंगे।
कावेरी की यह उपलब्धि भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाती है कि स्वदेशी एयरो-इंजन तकनीक को लगातार विकसित कर अलग-अलग रक्षा प्लेटफॉर्म की जरूरतों के अनुसार आगे बढ़ाया जा सकता है।

