देहरादून, 11 अक्टूबर 2026।
देवभूमि उत्तराखंड में शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व आज से शुरू हो रहा है। मां दुर्गा की उपासना के इस नौ दिवसीय महापर्व के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां शैलपुत्री को पर्वतराज हिमालय की पुत्री और आदिशक्ति मां दुर्गा का प्रथम स्वरूप माना जाता है। हिमालय की पवित्र धरती से गहरा संबंध रखने वाली मां शैलपुत्री की आराधना का उत्तराखंड की धार्मिक परंपराओं में विशेष आध्यात्मिक महत्व है।
नवरात्रि के पहले दिन घरों से लेकर मंदिरों तक मां दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाती है। श्रद्धालु कलश स्थापना कर नौ दिनों के व्रत और पूजा का संकल्प लेते हैं। मां शैलपुत्री से परिवार की सुख-समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य, मानसिक शांति और जीवन में दृढ़ता बनाए रखने की कामना की जाती है।
क्यों की जाती है नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां शैलपुत्री पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं। ‘शैल’ का अर्थ पर्वत और ‘पुत्री’ का अर्थ बेटी होता है। इसी कारण उन्हें शैलपुत्री कहा जाता है। मां का यह स्वरूप प्रकृति, शक्ति, धैर्य और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है।
नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा करने के पीछे आध्यात्मिक भाव यह है कि किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत मजबूत संकल्प, पवित्र विचार और अटूट विश्वास के साथ की जाए। जिस प्रकार पर्वत अपनी जगह अडिग रहता है, उसी प्रकार मां शैलपुत्री की उपासना भक्तों को जीवन की कठिन परिस्थितियों में धैर्य और दृढ़ता बनाए रखने की प्रेरणा देती है।
देवी भागवत और दुर्गा उपासना की परंपराओं में आदिशक्ति के विभिन्न स्वरूपों का वर्णन मिलता है। नवरात्रि में प्रथम देवी के रूप में मां शैलपुत्री की पूजा शक्ति की आराधना की शुरुआत मानी जाती है।
सती से शैलपुत्री तक की धार्मिक कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां शैलपुत्री का संबंध देवी सती से जुड़ा है। देवी सती भगवान शिव की पहली पत्नी थीं। कथा के अनुसार, राजा दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान होने से व्यथित होकर देवी सती ने यज्ञ की अग्नि में अपने प्राण त्याग दिए। इसके बाद उन्होंने पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया और पार्वती के नाम से जानी गईं।
इसी जन्म में देवी ने भगवान शिव को पुनः पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की। धार्मिक परंपरा में मां पार्वती के इसी पर्वत-पुत्री स्वरूप को मां शैलपुत्री के रूप में पूजा जाता है। यह कथा श्रद्धा, संकल्प और आध्यात्मिक साधना की शक्ति का संदेश देती है।
मां शैलपुत्री के स्वरूप में छिपा है विशेष संदेश
मां शैलपुत्री को सामान्यतः वृषभ यानी बैल पर विराजमान दिखाया जाता है। उनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में कमल का पुष्प होता है। त्रिशूल को शक्ति और दुष्टता के विनाश का प्रतीक माना जाता है, जबकि कमल पवित्रता और आध्यात्मिक चेतना का संदेश देता है।
उनका वृषभ पर सवार स्वरूप धर्म, धैर्य और दृढ़ता से भी जोड़ा जाता है। भक्त मां के इस स्वरूप का ध्यान कर अपने जीवन में सकारात्मकता, आत्मविश्वास और संयम बनाए रखने की प्रार्थना करते हैं।
उत्तराखंड में मां शैलपुत्री की आराधना का विशेष जुड़ाव
उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। हिमालय की पर्वत शृंखलाएं, प्राचीन तीर्थ और देवी-देवताओं से जुड़ी लोकमान्यताएं इस प्रदेश की धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। मां शैलपुत्री का पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में वर्णन उत्तराखंड की हिमालयी संस्कृति से एक स्वाभाविक आध्यात्मिक जुड़ाव स्थापित करता है।
हरिद्वार और देहरादून सहित प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में नवरात्रि के दौरान मंदिरों में पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। श्रद्धालु मां दुर्गा के नौ स्वरूपों का स्मरण कर सुख-शांति और कल्याण की कामना करते हैं। मंदिरों में दर्शन करने के साथ कई परिवार अपने घरों में भी नियमित पूजा और दुर्गा सप्तशती के पाठ का आयोजन करते हैं।
कैसे करें पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा?
धार्मिक परंपरा के अनुसार, नवरात्रि के पहले दिन सुबह स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूजा स्थल की सफाई की जाती है। इसके बाद विधि-विधान के अनुसार कलश स्थापना और मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। देवी को पुष्प अर्पित कर धूप-दीप जलाया जाता है और मंत्रों के साथ आरती की जाती है।
मां शैलपुत्री का प्रचलित मंत्र है—
ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः।
भक्त इस मंत्र का जाप कर मां से आशीर्वाद की कामना करते हैं। पूजा में सबसे महत्वपूर्ण भाव श्रद्धा, शुद्ध मन और सच्चे संकल्प का माना जाता है। पूजा की विधि परिवार की परंपरा और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
शक्ति, विश्वास और नई शुरुआत का पर्व
नवरात्रि केवल व्रत और पूजा का अवसर नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और अपने भीतर सकारात्मक बदलाव लाने का समय भी माना जाता है। मां शैलपुत्री की आराधना के साथ शुरू होने वाले इन नौ दिनों में श्रद्धालु अपने जीवन में संयम, साहस और सद्भाव अपनाने का संकल्प लेते हैं।
उत्तराखंड में नवरात्रि का यह पर्व हिमालय की आध्यात्मिक परंपरा और मां दुर्गा के प्रति अटूट आस्था की अनुभूति कराता है। पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा के साथ शुरू होने वाली साधना भक्तों को यह संदेश देती है कि जीवन की हर नई शुरुआत विश्वास, धैर्य और दृढ़ संकल्प के साथ करनी चाहिए।

