देहरादून ; 28.09.2026।
भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे चर्चित युवा क्रांतिकारियों में शामिल शहीद-ए-आजम भगत सिंह की आज 119वीं जयंती मनाई जा रही है। 28 सितंबर 1907 को जन्मे भगत सिंह ने बेहद कम उम्र में ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष का रास्ता चुना। उनका जीवन केवल क्रांतिकारी गतिविधियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उनके लेखन और विचारों में सामाजिक बराबरी, शोषण से मुक्ति और एक बेहतर समाज की कल्पना भी दिखाई देती है।
जयंती के अवसर पर देश के अलग-अलग हिस्सों में श्रद्धांजलि कार्यक्रम, विचार यात्राएं, सांस्कृतिक आयोजन और युवाओं से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। पंजाब में इस दिन को विशेष रूप से याद किया जा रहा है। राज्य सरकार ने 28 सितंबर को सार्वजनिक अवकाश घोषित किया है। इसके तहत सरकारी कार्यालयों के साथ स्कूल-कॉलेज और मान्यता प्राप्त शिक्षण संस्थान भी बंद हैं।
लुधियाना में ‘जश्न-ए-इंकलाब’ का आयोजन
भगत सिंह की जयंती पर लुधियाना स्थित पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के मैदान में आज ‘जश्न-ए-इंकलाब’ कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। कार्यक्रम में नाटक, पंजाबी संगीत और पारंपरिक प्रस्तुतियों के साथ भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के बलिदान को याद किया जाएगा। आयोजन को पंजाब की सांस्कृतिक विरासत और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी स्मृतियों से जोड़कर प्रस्तुत किया जा रहा है।
पूर्णिया में निकलेगी विचार यात्रा
बिहार के पूर्णिया में भी भगत सिंह की जयंती के मौके पर ‘भगत सिंह विचार यात्रा’ निकाली जा रही है। आयोजकों के अनुसार यात्रा रंगभूमि मैदान से शुरू होकर शहर के प्रमुख मार्गों से गुजरते हुए आरएन साह चौक पर समाप्त होगी। इसके बाद भगत सिंह के विचारों को युवाओं और आम लोगों तक पहुंचाने के लिए विचार रथ, चलते-फिरते पुस्तकालय और युवा संवाद जैसे कार्यक्रम भी प्रस्तावित हैं।
भगत सिंह का जीवन आज भी चर्चा में क्यों?
भगत सिंह की पहचान सिर्फ एक ऐसे युवा क्रांतिकारी के तौर पर नहीं है, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया। उनके व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पक्ष उनका अध्ययन और लेखन भी था। वे राजनीतिक और सामाजिक सवालों पर गंभीरता से विचार करते थे। उनके लेखों और जेल के दौरान लिखे गए विचारों में स्वतंत्रता के साथ सामाजिक परिवर्तन की चिंता भी नजर आती है।
यही कारण है कि हर वर्ष 28 सितंबर को होने वाले कार्यक्रमों में उनके जीवन के साथ-साथ उनके विचारों पर भी चर्चा होती है। स्कूल-कॉलेजों में भाषण, निबंध, परिचर्चा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए नई पीढ़ी को उनके संघर्ष से परिचित कराया जाता है।
23 साल की उम्र में देश के लिए दिया सर्वोच्च बलिदान
भगत सिंह का जीवन महज 23 वर्षों का रहा। स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहते हुए वे ब्रिटिश सरकार की नजरों में आए और अंततः 23 मार्च 1931 को राजगुरु और सुखदेव के साथ उन्हें फांसी दी गई। उनके बलिदान ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में युवाओं की भूमिका और क्रांतिकारी विचारधारा को व्यापक चर्चा का विषय बनाया।
जयंती पर संदेश सिर्फ श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं
भगत सिंह जयंती हर साल यह सवाल भी सामने लाती है कि उनके विचारों को आज की पीढ़ी किस तरह समझती है। देशभर में आयोजित हो रहे विचार और युवा संवाद कार्यक्रम इसी दिशा में एक प्रयास हैं। समारोहों में उनके साहस और बलिदान को याद करने के साथ उनके अध्ययन, लेखन और सामाजिक चिंतन पर भी चर्चा की जा रही है।
28 सितंबर का दिन इसलिए भी खास है क्योंकि भगत सिंह का नाम भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में उस पीढ़ी के प्रतिनिधि के रूप में दर्ज है, जिसने कम उम्र में ही देश की आजादी को अपने जीवन का प्रमुख लक्ष्य बना लिया था। उनकी 119वीं जयंती पर देशभर में उन्हें श्रद्धांजलि दी जा रही है और उनके जीवन से जुड़े प्रसंगों को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जा रहा है।

