देहरादून ; 4 नवम्बर 2026,
देहरादून। पूर्वी दून घाटी की प्राकृतिक पहचान और जल संसाधनों का महत्वपूर्ण आधार मानी जाने वाली सौंग नदी को संरक्षित करने की दिशा में एक नई पहल शुरू की गई है। स्प्रिंग एंड रिवर रिजुविनेशन अथॉरिटी (SARRA), उत्तराखण्ड के अंतर्गत नदी की पारिस्थितिक स्थिति का आकलन करने के लिए ‘बायो इंडिकेटर प्रोजेक्ट’ प्रारंभ किया गया है। इस अध्ययन के माध्यम से नदी के पानी की गुणवत्ता, आसपास के प्राकृतिक आवासों की स्थिति और मानवीय गतिविधियों से पड़ने वाले प्रभावों को जीव-जंतुओं की मौजूदगी और उनकी विविधता के आधार पर समझा जाएगा।
इस परियोजना का विशेष उद्देश्य यह जानना है कि सौंग नदी का प्राकृतिक तंत्र कितना स्वस्थ है और समय के साथ उसमें किस तरह के बदलाव आ रहे हैं। इसके लिए केवल पानी के नमूनों या भौतिक परीक्षणों पर निर्भर रहने के बजाय ऐसे जीवों का अध्ययन किया जाएगा, जिनकी उपस्थिति, संख्या और प्रजातियों में बदलाव पर्यावरण की स्थिति के बारे में महत्वपूर्ण संकेत देते हैं। भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के पूर्व वरिष्ठ प्राध्यापक एवं वैज्ञानिक ‘जी’ डॉ. वी.पी. उनियाल के मार्गदर्शन में यह शोध कार्य पूरा किया जाएगा।
पांच जीव-समूह बनेंगे पर्यावरण की स्थिति जानने का आधार
अध्ययन के दौरान पांच प्रमुख जैविक समूहों को सर्वे का हिस्सा बनाया गया है। इनमें जलीय मैक्रोइनवर्टेब्रेट्स, मधुमक्खियां, ड्रैगनफ्लाई एवं डेम्सलफ्लाई (ओडोनाटा) और पक्षियों की विभिन्न प्रजातियां शामिल हैं। इन जीवों को पर्यावरणीय बदलावों के महत्वपूर्ण संकेतक के रूप में देखा जाएगा।
जलीय मैक्रोइनवर्टेब्रेट्स के अध्ययन से नदी के भीतर जल की गुणवत्ता और जलीय पारिस्थितिकी की स्थिति समझने में सहायता मिलेगी। वहीं मधुमक्खियों की विविधता आसपास की वनस्पतियों, परागण व्यवस्था और प्राकृतिक आवासों के बारे में जानकारी देगी। ड्रैगनफ्लाई और डेम्सलफ्लाई की प्रजातियां जल एवं आसपास के पर्यावरण में होने वाले बदलावों का संकेत देंगी। इसके साथ ही पक्षियों की प्रजातियों और उनकी मौजूदगी का रिकॉर्ड तैयार कर नदी किनारे के आवासों की स्थिति का आकलन किया जाएगा।
80 किलोमीटर के नदी क्षेत्र में होगा विस्तृत सर्वे
यह अध्ययन सौंग नदी के उद्गम स्थल कद्दूखाल, टिहरी से लेकर गंगा नदी के साथ उसके संगम क्षेत्र तेहरी फार्म, देहरादून तक लगभग 80 किलोमीटर के क्षेत्र में किया जाएगा। पूरे नदी क्षेत्र को भौगोलिक स्थिति और पर्यावरणीय विशेषताओं के आधार पर तीन हिस्सों में बांटा गया है। इनमें ऊपरी क्षेत्र (Upper Zone), मध्य क्षेत्र (Middle Zone) और निचला क्षेत्र (Lower Zone) शामिल हैं।
प्रत्येक क्षेत्र में 12 स्थायी सर्वेक्षण केंद्र बनाए जाएंगे। इस प्रकार कुल 36 स्थानों पर नियमित रूप से अध्ययन किया जाएगा। इन स्थानों पर दो अलग-अलग मौसमी चरणों में सर्वेक्षण होगा, जिससे मौसम के अनुसार जीवों की उपस्थिति और पारिस्थितिक बदलावों की तुलना की जा सकेगी।
मानसून के बाद और पहले जुटाए जाएंगे आंकड़े
परियोजना का फील्ड वर्क नवंबर से अप्रैल के बीच पूरा किया जाएगा। इसमें मानसून के बाद (Post-monsoon) और मानसून से पहले (Pre-monsoon) के चरण शामिल होंगे। दोनों अवधियों में एकत्र किए गए आंकड़ों के आधार पर यह समझने का प्रयास किया जाएगा कि बारिश के बाद नदी और उसके आसपास के आवासों में क्या परिवर्तन आते हैं तथा मानसून से पहले उनकी स्थिति किस तरह रहती है।
इस प्रक्रिया से अलग-अलग मौसमों में जैव विविधता के स्वरूप, जीवों की उपलब्धता और नदी के पर्यावरण पर पड़ने वाले दबावों का तुलनात्मक विश्लेषण संभव होगा।
सौंग बांध, खनन और शहरीकरण के प्रभावों को समझने में मिलेगी मदद
इस छह महीने की परियोजना का एक महत्वपूर्ण परिणाम सौंग नदी का वैज्ञानिक आधारभूत डेटाबेस (Baseline Database) तैयार होना होगा। इसमें नदी के विभिन्न हिस्सों में मिलने वाले जीवों, उनकी विविधता और पर्यावरणीय परिस्थितियों से जुड़े आंकड़े दर्ज किए जाएंगे।
यह डेटाबेस भविष्य में नदी पर पड़ने वाले विकासात्मक और मानवीय दबावों के प्रभावों को समझने में उपयोगी साबित हो सकता है। विशेष रूप से प्रस्तावित सौंग बांध, नदी क्षेत्र में होने वाली खनन गतिविधियों और तेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण पारिस्थितिकी में आने वाले बदलावों का आकलन करने के लिए यह अध्ययन महत्वपूर्ण आधार उपलब्ध कराएगा।
इसके अलावा, शोध से मिलने वाले निष्कर्ष नदी के संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, जैव विविधता के संरक्षण और प्राकृतिक आवासों के बेहतर प्रबंधन में भी सहायक हो सकते हैं।
वैज्ञानिक आंकड़ों से बनेगी संरक्षण की आगे की रणनीति
सौंग नदी केवल पानी का स्रोत नहीं है, बल्कि इससे जुड़ी वनस्पतियां, जलीय जीव, पक्षी और आसपास के प्राकृतिक आवास मिलकर एक विस्तृत पारिस्थितिक तंत्र बनाते हैं। इस तंत्र के किसी एक हिस्से में होने वाला बदलाव दूसरे हिस्सों को भी प्रभावित कर सकता है। ऐसे में जैव संकेतकों के माध्यम से नदी की नियमित निगरानी करना संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
परियोजना से प्राप्त वैज्ञानिक निष्कर्षों के आधार पर नदी के संरक्षण, जैव विविधता की सुरक्षा और मानवीय गतिविधियों के नियमन के लिए भविष्य की योजनाएं तैयार करने में मदद मिलेगी। साथ ही, यह अध्ययन आने वाले समय में सौंग नदी की पारिस्थितिक सेहत में होने वाले बदलावों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ के रूप में काम कर सकेगा।

