देहरादून ; 26.06.2026।
चमोली/बदरीनाथ। पितृ पक्ष की शुरुआत के साथ ही उत्तराखंड के विश्वप्रसिद्ध श्री बदरीनाथ धाम में श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ने लगी है। देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग अपने दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की शांति और पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण एवं पिंडदान करने के लिए बदरीनाथ पहुंच रहे हैं। इस वर्ष पितृ पक्ष 26 सितंबर से शुरू होकर 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ संपन्न होगा।
ब्रह्मकपाल में पितृ कर्म का विशेष महत्व
बदरीनाथ मंदिर से कुछ दूरी पर अलकनंदा नदी के तट पर स्थित ब्रह्मकपाल को पितृ कर्म के लिए विशेष धार्मिक महत्व वाला स्थान माना जाता है। श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति भी ब्रह्मकपाल को ऐसा स्थान बताती है, जहां श्रद्धालु अपने पूर्वजों की मृत आत्माओं के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ब्रह्मकपाल में किए गए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान का विशेष फल प्राप्त होता है। कई परंपराओं में यह भी मान्यता प्रचलित है कि यहां विधि-विधान से पितृ कर्म करने के बाद उसी पितर के लिए दोबारा श्राद्ध करने की आवश्यकता नहीं रहती। यह धार्मिक मान्यता है, जिसका पालन श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा और आस्था के अनुसार करते हैं।
भगवान शिव और ब्रह्मकपाल से जुड़ी मान्यता
ब्रह्मकपाल को लेकर एक प्रमुख पौराणिक मान्यता भगवान शिव से जुड़ी है। मान्यता है कि भगवान शिव को ब्रह्महत्या के दोष से मुक्ति इसी क्षेत्र में भगवान नारायण की कृपा से मिली थी। इसी से जुड़ी कथा में ब्रह्मा जी के कपाल के यहां गिरने की बात कही जाती है, जिसके कारण इस स्थान का नाम ब्रह्मकपाल पड़ा।
भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल ‘अतुल्य भारत’ पर भी ब्रह्मकपाल को पूर्वजों की आत्मा को श्रद्धांजलि देने वाले महत्वपूर्ण स्थान के रूप में वर्णित किया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यहां श्राद्ध कर्म और अंतिम संस्कार से दिवंगत आत्मा को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिलने की कामना की जाती है।
पितृ पक्ष में क्यों बढ़ जाती है भीड़?
सनातन परंपरा में पितृ पक्ष को पूर्वजों के स्मरण और उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का समय माना जाता है। इस अवधि में लोग अपने दिवंगत परिजनों की मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध करते हैं। तर्पण में जल, तिल और कुश आदि अर्पित करने की परंपरा है, जबकि पिंडदान में पितरों के निमित्त पिंड अर्पित किए जाते हैं।
मान्यता है कि श्राद्ध और तर्पण के माध्यम से पितरों को संतुष्टि एवं शांति प्राप्त होती है और परिवार के लोग उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इसी धार्मिक विश्वास के चलते पितृ पक्ष में गया, हरिद्वार, प्रयागराज और बदरीनाथ के ब्रह्मकपाल जैसे तीर्थों पर श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है।
बदरीनाथ में महापिंडदान की परंपरा
स्थानीय धार्मिक परंपरा के अनुसार पितृ कर्म के लिए गया, काशी, प्रयागराज और हरिद्वार-ऋषिकेश जैसे तीर्थों के बाद बदरीनाथ के ब्रह्मकपाल में महापिंडदान किए जाने की परंपरा भी बताई जाती है। स्थानीय आचार्यों के अनुसार श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा और निर्धारित तिथि के अनुसार यहां पितरों का तर्पण करते हैं।
पितृ पक्ष के दौरान ब्रह्मकपाल में सुबह से ही श्रद्धालुओं की आवाजाही देखी जा रही है। लोग अलकनंदा के तट पर पहुंचकर अपने पूर्वजों को जल अर्पित करते हैं और पंडितों के मार्गदर्शन में श्राद्ध एवं पिंडदान की प्रक्रिया पूरी करते हैं।
बदरीनाथ में इस साल श्रद्धालुओं की रिकॉर्ड संख्या
पितृ पक्ष से पहले ही इस वर्ष बदरीनाथ धाम में श्रद्धालुओं की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 24 सितंबर तक प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार इस यात्रा सीजन में बदरीनाथ में 17.79 लाख से अधिक श्रद्धालु दर्शन कर चुके थे, जो धाम के इतिहास में नया रिकॉर्ड बताया गया है।
ऐसे में पितृ पक्ष शुरू होने के बाद ब्रह्मकपाल में पितृ कर्म के लिए आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में और वृद्धि देखी जा रही है। सर्वपितृ अमावस्या के आसपास श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने की संभावना रहती है, क्योंकि इस दिन उन पितरों के लिए भी श्राद्ध किया जाता है जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती या जिनका श्राद्ध निर्धारित तिथि पर नहीं हो पाया हो।
आस्था के साथ पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का पर्व
पितृ पक्ष को केवल धार्मिक कर्मकांड के रूप में नहीं, बल्कि अपनी पिछली पीढ़ियों को याद करने और उनके प्रति सम्मान एवं कृतज्ञता व्यक्त करने के अवसर के रूप में भी देखा जाता है। बदरीनाथ का ब्रह्मकपाल इस भाव को हिमालय, अलकनंदा और भगवान बदरीविशाल की आध्यात्मिक परंपरा से जोड़ता है।
यही वजह है कि पितृ पक्ष के दौरान बदरीनाथ धाम में धार्मिक गतिविधियां बढ़ जाती हैं और दूर-दराज से श्रद्धालु अपने पूर्वजों के निमित्त तर्पण एवं पिंडदान करने के लिए यहां पहुंचते हैं। ब्रह्मकपाल में गूंजते वैदिक मंत्र, अलकनंदा का प्रवाह और पितरों के प्रति श्रद्धा का भाव इस दौरान बदरीनाथ धाम के वातावरण को और अधिक आध्यात्मिक बना देता है।

