देहरादून ; 21.09.2026।
देहरादून। उत्तराखंड की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बीच परिवहन व्यवस्था को नई दिशा देने की तैयारी तेज हो गई है। राज्य सरकार ने प्रदेश को देश के प्रमुख रोपवे हब के रूप में विकसित करने की दिशा में कदम बढ़ाते हुए करीब 160 किलोमीटर लंबाई की 51 रोपवे परियोजनाओं को प्रस्तावित किया है। इन परियोजनाओं को केंद्र और राज्य सरकार की साझेदारी से आगे बढ़ाया जा रहा है। सरकार का फोकस खासतौर पर ऐसे धार्मिक, पर्यटन और दुर्गम क्षेत्रों को बेहतर कनेक्टिविटी से जोड़ने पर है, जहां सड़क निर्माण चुनौतीपूर्ण है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने संबंधित कार्यदायी संस्थाओं को परियोजनाओं में तेजी लाने और आगामी 9 नवंबर तक रोपवे परियोजनाओं के कार्य धरातल पर शुरू करने के निर्देश दिए हैं। सरकार का मानना है कि पर्वतीय राज्य की परिस्थितियों में रोपवे सड़क परिवहन के साथ एक प्रभावी वैकल्पिक साधन बन सकता है।
सड़क के साथ अब आसमान से जुड़ेंगे पहाड़
उत्तराखंड में लगातार बढ़ते पर्यटक और तीर्थयात्रियों के दबाव के बीच परिवहन के नए विकल्प की जरूरत महसूस की जा रही है। वर्ष 2025 में 6 करोड़ 3 लाख से अधिक पर्यटक और तीर्थयात्री प्रदेश पहुंचे। पर्यटन एवं धार्मिक स्थलों पर बढ़ती आवाजाही का सीधा असर प्रमुख सड़कों और संपर्क मार्गों पर दिखाई देता है।
ऐसे में प्रस्तावित रोपवे परियोजनाओं को केवल पर्यटन सुविधा के तौर पर नहीं, बल्कि प्रदेश की व्यापक परिवहन व्यवस्था का हिस्सा माना जा रहा है। सरकार के मुताबिक रोपवे से सड़क मार्गों पर वाहनों का दबाव कम करने, यात्रा समय घटाने और दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंच आसान बनाने में मदद मिल सकती है।
मसूरी जाने में लगेगा आधे घंटे से भी कम समय
देहरादून जिले में पुरुकुल गांव से लाइब्रेरी मसूरी तक करीब 5.2 किलोमीटर लंबे रोपवे का निर्माण कार्य प्रगति पर है। परियोजना पूरी होने के बाद देहरादून से मसूरी की यात्रा में लगने वाला मौजूदा एक से डेढ़ घंटे का समय घटकर लगभग 15 से 20 मिनट रह जाने की उम्मीद है।
मसूरी जैसे प्रमुख पर्यटन स्थल पर पर्यटकों की बढ़ती संख्या के बीच यह परियोजना सड़क यातायात के दबाव को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। खासकर पर्यटन सीजन में देहरादून-मसूरी मार्ग पर वाहनों की संख्या बढ़ने से होने वाली परेशानी को कम करने में रोपवे की भूमिका अहम हो सकती है।
यमुनोत्री जाने वाले श्रद्धालुओं को मिलेगी बड़ी राहत
चारधाम यात्रा के प्रमुख पड़ावों में शामिल यमुनोत्री के लिए भी रोपवे परियोजना प्रस्तावित है। जानकी चट्टी (खरसाली)-यमुनोत्री रोपवे के निर्माण से श्रद्धालुओं को करीब पांच किलोमीटर की खड़ी पैदल चढ़ाई से राहत मिलने की उम्मीद है।
यमुनोत्री धाम तक पहुंचने के लिए वर्तमान में श्रद्धालुओं को कठिन पहाड़ी रास्ते से गुजरना पड़ता है। रोपवे बनने के बाद यात्रा अधिक सुविधाजनक हो सकती है और बुजुर्गों तथा शारीरिक रूप से पैदल चढ़ाई में कठिनाई महसूस करने वाले यात्रियों के लिए भी पहुंच आसान होने की संभावना है।
पूर्णागिरि धाम के लिए भी रोपवे पर जोर
चंपावत जिले के प्रसिद्ध श्री पूर्णागिरि धाम को भी रोपवे कनेक्टिविटी से जोड़ने की तैयारी है। उत्तर भारत के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल पूर्णागिरि में हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
इस वर्ष 1 अप्रैल से 19 सितंबर तक 24 लाख 62 हजार 319 श्रद्धालु पूर्णागिरि धाम पहुंच चुके हैं। पहाड़ी मार्ग और कठिन चढ़ाई के कारण यहां पहुंचने वाले यात्रियों को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। प्रस्तावित ठुलीगाड़-पूर्णागिरि रोपवे से श्रद्धालुओं की यात्रा को आसान बनाने की योजना है।
नीलकंठ रोपवे पर सरकार का विशेष फोकस
रोपवे परियोजनाओं में फिलहाल ऋषिकेश के त्रिवेणी घाट से पौड़ी जिले के नीलकंठ महादेव मंदिर तक प्रस्तावित रोपवे को प्राथमिकता दी जा रही है। आवास सचिव डॉ. आर. राजेश कुमार के अनुसार इस परियोजना की कुल लंबाई करीब छह किलोमीटर होगी, जबकि पहले चरण में 4.1 किलोमीटर लंबे हिस्से पर काम प्रस्तावित है।
ऋषिकेश से नीलकंठ मंदिर तक बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की आवाजाही होती है। ऐसे में रोपवे के जरिए इस क्षेत्र में सड़क यातायात का दबाव कम करने की उम्मीद की जा रही है। परियोजना के पूरा होने पर धार्मिक पर्यटन के लिहाज से भी क्षेत्र को नई सुविधा मिल सकती है।
हरिद्वार में चंडी देवी-मंसा देवी के लिए नए अलाइनमेंट
हरिद्वार की महत्वपूर्ण रोपवे कनेक्टिविटी को भी विस्तार देने की तैयारी है। चंडी देवी-मंसा देवी रोपवे परियोजना के तहत मौजूदा अलाइनमेंट के अलावा दो समानांतर नए अलाइनमेंट विकसित किए जा रहे हैं। इसका उद्देश्य बढ़ती श्रद्धालु संख्या के अनुरूप रोपवे व्यवस्था की क्षमता और कनेक्टिविटी को मजबूत करना है।
हरिद्वार और ऋषिकेश धार्मिक पर्यटन के बड़े केंद्र हैं। यहां सालभर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की आवाजाही रहती है। ऐसे में इन क्षेत्रों में बेहतर रोपवे नेटवर्क विकसित होने से परिवहन व्यवस्था पर पड़ने वाले अतिरिक्त दबाव को कम करने में मदद मिल सकती है।
अल्मोड़ा, देहरादून और नैनीताल में फिजिबिलिटी स्टडी
प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी रोपवे की संभावनाएं तलाशने का काम चल रहा है। अल्मोड़ा, देहरादून और नैनीताल जनपदों की विभिन्न प्रस्तावित रोपवे परियोजनाएं फिजिबिलिटी स्टडी के लिए उत्तराखंड मेट्रो को हस्तांतरित की गई हैं।
फिजिबिलिटी स्टडी के जरिए परियोजनाओं की तकनीकी व्यवहार्यता, संभावित मार्ग, यात्री क्षमता और अन्य जरूरी पहलुओं का अध्ययन किया जाएगा। इसके बाद परियोजनाओं को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया में तेजी आने की संभावना है।
रोजगार से लेकर स्थानीय कारोबार तक दिख सकता है असर
सरकार रोपवे परियोजनाओं को केवल परिवहन सुविधा के तौर पर नहीं देख रही है। इन परियोजनाओं से धार्मिक और पर्यटन स्थलों पर पर्यटकों की पहुंच बढ़ने के साथ स्थानीय कारोबार को भी लाभ मिलने की उम्मीद है।
रोपवे स्टेशनों के आसपास होटल, होमस्टे, दुकानें, स्थानीय उत्पाद, परिवहन और अन्य सेवाओं से जुड़े रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में स्वरोजगार को बढ़ावा देने में भी बेहतर कनेक्टिविटी की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
पर्यावरणीय दबाव कम करने पर भी नजर
उत्तराखंड जैसे संवेदनशील पर्वतीय राज्य में बड़े पैमाने पर सड़क निर्माण अपने साथ पर्यावरणीय और भौगोलिक चुनौतियां भी लेकर आता है। सरकार का तर्क है कि रोपवे नेटवर्क विकसित होने से कुछ क्षेत्रों में सड़क आधारित परिवहन पर निर्भरता घटाई जा सकती है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के अनुसार, राज्य की विषम भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए रोपवे कनेक्टिविटी महत्वपूर्ण है। इससे धार्मिक और पर्यटन स्थलों तक पहुंच आसान होने के साथ सड़कों पर यातायात का दबाव कम करने और पर्यावरण संरक्षण में मदद मिल सकती है।
कुल मिलाकर, 51 प्रस्तावित रोपवे परियोजनाएं उत्तराखंड की परिवहन व्यवस्था में बड़ा बदलाव लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल हैं। यदि इन परियोजनाओं को तय समयसीमा के अनुसार जमीन पर उतारा जाता है, तो आने वाले वर्षों में प्रदेश के कई प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थल सड़क मार्ग के साथ-साथ आधुनिक रोपवे नेटवर्क से भी जुड़ सकते हैं।

