देहरादून, 4 सितंबर।
भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर आज देशभर में श्रद्धा और उत्साह का माहौल है। मंदिरों को रंग-बिरंगी रोशनी और फूलों से सजाया गया है। जगह-जगह भगवान श्रीकृष्ण की आकर्षक झांकियां सजाई गई हैं और भजन-कीर्तन के साथ धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। श्रद्धालु व्रत रखकर भगवान कृष्ण की पूजा-अर्चना कर रहे हैं और मध्यरात्रि में उनके जन्म का उत्सव मनाने की तैयारियों में जुटे हैं।
मथुरा की धरती पर हुआ था भगवान श्रीकृष्ण का जन्म
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा में देवकी और वासुदेव के पुत्र के रूप में हुआ था। उस समय मथुरा का राजा कंस था, जो अपनी बहन देवकी के आठवें पुत्र से भयभीत था। भविष्यवाणी के अनुसार देवकी की आठवीं संतान ही कंस के अत्याचार का अंत करने वाली थी।
कंस ने देवकी और वासुदेव को कारागार में बंद कर दिया। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म कारागार में आधी रात के समय हुआ। उनके जन्म के बाद वासुदेव उन्हें यमुना पार कर गोकुल ले गए, जहां उनका पालन-पोषण नंद बाबा और माता यशोदा के स्नेह में हुआ।
गोकुल और वृंदावन में बीता बाल्यकाल
कन्हैया का बचपन गोकुल और वृंदावन में बीता। उनकी बाल लीलाएं आज भी भक्तों के लिए श्रद्धा और आनंद का विषय हैं। माखन चोरी, गोप-गोपियों के साथ उनकी लीलाएं और बांसुरी की मधुर धुन से जुड़ी कथाएं भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप को दर्शाती हैं।
भगवान कृष्ण ने बचपन में ही कई असुरों का वध कर लोगों को उनके अत्याचार से मुक्ति दिलाई। कालिया नाग के दमन और गोवर्धन पर्वत उठाने की कथा भी उनके जीवन की प्रमुख घटनाओं में शामिल है। गोवर्धन पूजा की परंपरा को भी इसी प्रसंग से जोड़ा जाता है।
कंस का किया अंत
युवावस्था में भगवान श्रीकृष्ण मथुरा पहुंचे और अपने अत्याचारी मामा कंस का वध किया। इसके बाद उन्होंने अपने माता-पिता को कारागार से मुक्त कराया और मथुरा की जनता को कंस के अत्याचार से मुक्ति दिलाई।
बाद में श्रीकृष्ण ने द्वारका नगरी को अपनी कर्मभूमि बनाया। उनके जीवन में धर्म की रक्षा, अन्याय के विरुद्ध संघर्ष और समाज के कल्याण का संदेश प्रमुख रूप से दिखाई देता है।
महाभारत में निभाई महत्वपूर्ण भूमिका
भगवान श्रीकृष्ण का जीवन केवल उनकी बाल लीलाओं तक सीमित नहीं था। महाभारत के समय उन्होंने पांडवों का मार्गदर्शन किया और अर्जुन के सारथी बने। कुरुक्षेत्र के युद्ध में जब अर्जुन अपने प्रियजनों और गुरुजनों को सामने देखकर मोह में पड़ गए, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें भगवद्गीता का ज्ञान दिया।
गीता में भगवान कृष्ण ने कर्म, धर्म और कर्तव्य का महत्व समझाते हुए मनुष्य को अपने कर्तव्य का पालन करने की प्रेरणा दी। उनका संदेश आज भी जीवन में कठिन परिस्थितियों का सामना करने और सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
प्रेम, धर्म और कर्म का संदेश देती है जन्माष्टमी
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल भगवान कृष्ण के जन्म का पर्व नहीं, बल्कि उनके जीवन और शिक्षाओं को याद करने का अवसर भी है। कृष्ण का जीवन हमें प्रेम, करुणा, मित्रता, बुद्धिमत्ता और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
जन्माष्टमी के अवसर पर मंदिरों में ‘नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की’ जैसे भजनों की गूंज सुनाई दे रही है। रात 12 बजे भगवान कृष्ण के जन्म के समय विशेष पूजा, आरती और अभिषेक किया जाएगा। श्रद्धालु भगवान के बाल स्वरूप को झूला झुलाकर जन्मोत्सव मनाएंगे।
बाजारों में भी जन्माष्टमी की रौनक देखने को मिल रही है। कान्हा की पोशाक, मोरपंख, बांसुरी, झूले और सजावटी सामान की खरीदारी के लिए लोग बाजारों में पहुंच रहे हैं। छोटे बच्चों को कान्हा के रूप में सजाने को लेकर भी परिवारों में खासा उत्साह है।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व हमें यह संदेश देता है कि जब-जब अधर्म बढ़ता है, तब धर्म और सत्य की स्थापना के लिए संघर्ष आवश्यक है। भगवान कृष्ण की शिक्षाएं आज भी मानव जीवन को सही कर्म, संयम और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती हैं।

