देहरादून ; 26.08.2026।
देहरादून। उत्तराखंड की पहाड़ी अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका केवल परिवार संभालने तक सीमित नहीं है। खेती-बागवानी से लेकर पशुपालन, स्थानीय उत्पादों और छोटे कारोबार तक ग्रामीण क्षेत्रों की बड़ी संख्या में महिलाएं सीधे तौर पर आजीविका से जुड़ी हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य सरकार की योजनाओं का फोकस महिलाओं को शिक्षा, आर्थिक अवसर, सामाजिक सुरक्षा और आत्मनिर्भरता से जोड़ने पर है।
बेटी के जन्म से शिक्षा तक आर्थिक सहारा
महिला सशक्तिकरण की शुरुआत बेटियों को बेहतर अवसर देने से करने के उद्देश्य से नंदा गौरा योजना संचालित की जा रही है। योजना के तहत पात्र बालिकाओं को जन्म और शिक्षा से जुड़े चरणों में आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाती है। इसका उद्देश्य परिवारों पर आर्थिक दबाव कम करने के साथ बेटियों की पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रोत्साहन देना है। महिला एवं बाल विकास विभाग की वेबसाइट पर वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए भी नंदा गौरा योजना के आवेदन से संबंधित सूचना उपलब्ध है।
सरकार की नीतियों में बालिकाओं के स्वास्थ्य और पोषण को भी अहम स्थान दिया गया है। मुख्यमंत्री महालक्ष्मी किट योजना, महिला पोषण से जुड़ी पहल और प्रसूता महिलाओं के लिए संचालित योजनाओं के जरिए मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य को बेहतर बनाने पर जोर दिया जा रहा है। राज्य के 2025-26 बजट में भी नंदा गौरा, महालक्ष्मी किट, महिला पोषण और ईजा-बोई शगुन जैसी योजनाओं के लिए प्रावधान किए गए थे।
स्वयं सहायता समूहों से बढ़ रही कमाई की राह
महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए स्वयं सहायता समूहों को महत्वपूर्ण माध्यम बनाया गया है। लखपति दीदी पहल के जरिए महिलाओं को केवल समूह से जोड़ने के बजाय उनकी आय बढ़ाने वाली गतिविधियों को प्रोत्साहित करने पर जोर है। उत्तराखंड सरकार के अनुसार लखपति दीदी योजना के तहत महिला स्वयं सहायता समूहों को 5 लाख रुपये तक का ब्याजमुक्त ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है और एक लाख से अधिक महिलाएं ‘लखपति दीदी’ बन चुकी हैं।
ग्रामीण विकास विभाग ने लखपति दीदी के लिए अलग रणनीति और एसओपी भी जारी की है। इससे संकेत मिलता है कि महिलाओं की आय बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण, स्थानीय उत्पाद, बाजार से जुड़ाव और आजीविका के अलग-अलग साधनों को एक साथ आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।
रोजगार में भागीदारी बढ़ाने की कोशिश
महिलाओं को सरकारी रोजगार में अधिक अवसर देने के लिए उत्तराखंड में सरकारी सेवाओं में महिलाओं को 30 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण दिया जा रहा है। इसके अलावा सहकारी समितियों में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान बताया गया है।
इसका असर केवल रोजगार के अवसरों तक सीमित नहीं माना जा सकता। नियमित आय और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ने से महिलाओं की परिवार तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था में भूमिका भी मजबूत होती है।
पहाड़ की महिलाओं के लिए स्थानीय आजीविका पर जोर
उत्तराखंड के दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार के सीमित विकल्प लंबे समय से चुनौती रहे हैं। ऐसे में महिला स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से स्थानीय संसाधनों पर आधारित कारोबार को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण हो जाता है। ग्रामीण विकास विभाग के दस्तावेजों में स्वयं सहायता समूहों के उत्पाद, मूल्य श्रृंखला और मिलेट बेकरी आउटलेट जैसे क्षेत्रों से संबंधित पहल दर्ज हैं।
इस मॉडल से महिलाओं को घर और गांव के आसपास ही आय का साधन विकसित करने का अवसर मिल सकता है। स्थानीय कृषि उत्पादों, पहाड़ी अनाज, हस्तशिल्प और अन्य ग्रामीण उत्पादों को बाजार मिलने पर इसका सीधा लाभ महिला समूहों की कमाई तक पहुंच सकता है।
शिक्षा से आत्मनिर्भरता तक लंबा फोकस
महिला सशक्तिकरण को व्यापक बनाने के लिए शिक्षा पर भी जोर दिया जा रहा है। तकनीकी शिक्षा में छात्राओं को प्रोत्साहित करने वाली योजनाएं उन्हें पारंपरिक रोजगार विकल्पों से आगे बढ़कर कौशल आधारित क्षेत्रों में जाने का अवसर देती हैं। राज्य के तकनीकी शिक्षा विभाग के अनुसार प्रगति योजना के तहत पात्र छात्राओं को तकनीकी शिक्षा के लिए प्रति वर्ष 50 हजार रुपये तक की सहायता दी जाती है।
कुल मिलाकर उत्तराखंड में महिला कल्याण की दिशा अब केवल सहायता उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं दिखाई देती, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, स्वरोजगार और वित्तीय आत्मनिर्भरता को एक-दूसरे से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। पहाड़ की महिलाओं के श्रम और योगदान को आर्थिक ताकत में बदलना इस नीति का अहम हिस्सा बन रहा है।

