देहरादून ; 24 अगस्त 2026।
चम्पावत,उत्तराखंड के चम्पावत जिले का देवीधुरा इन दिनों धार्मिक आस्था, लोक संस्कृति और सदियों पुरानी परंपरा के रंग में रंगा हुआ है। मां वाराही धाम में 13 दिवसीय बग्वाल मेले का आगाज हो चुका है। 23 अगस्त से शुरू हुआ यह आयोजन 4 सितंबर तक चलेगा। मेले का सबसे चर्चित पड़ाव 28 अगस्त को रक्षाबंधन के दिन सामने आएगा, जब खोलीखाड़ दुर्वाचौड़ मैदान में परंपरागत बग्वाल का आयोजन होगा।
देवीधुरा की बग्वाल सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह कुमाऊं की सामुदायिक परंपरा, लोकविश्वास और सामाजिक एकजुटता का भी अनोखा उदाहरण मानी जाती है। रक्षाबंधन के दिन होने वाले इस आयोजन को देखने के लिए हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक यहां पहुंचते हैं।
चार खामों की परंपरा से जुड़ा है बग्वाल का इतिहास
बग्वाल की पहचान चार प्रमुख खामों की भागीदारी से होती है। परंपरा में गहड़वाल, चमियाल, वालिक और लमगड़िया खामों के लोग अपनी-अपनी भूमिका के साथ मैदान में उतरते हैं। धार्मिक अनुष्ठानों और मंदिर की परिक्रमा के बाद प्रतिभागी खोलीखाड़ दुर्वाचौड़ मैदान की ओर बढ़ते हैं, जहां कुछ ही देर के लिए पूरा वातावरण पारंपरिक उत्साह से भर उठता है।
स्थानीय मान्यताओं में इस परंपरा की जड़ें नरबलि की प्राचीन कथा से जोड़ी जाती हैं। कहा जाता है कि मां वाराही को प्रसन्न करने के लिए कभी मानव बलि की परंपरा थी। बाद में लोकविश्वास के अनुसार ऐसी व्यवस्था बनी जिसमें सामूहिक रूप से रक्त अर्पण की मान्यता ने बग्वाल का स्वरूप लिया। यही कथा आज भी इस आयोजन की धार्मिक पृष्ठभूमि का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
शंख की आवाज के साथ शुरू होती है बग्वाल
बग्वाल का सबसे रोमांचक क्षण उस समय आता है जब चारों खामों के प्रतिभागी परंपरागत ढालों के साथ मैदान में आमने-सामने होते हैं। मंदिर के पुजारी के शंखनाद के साथ आयोजन शुरू होने की परंपरा है। कुछ समय तक मैदान में पारंपरिक ढालों और प्रहारों का सिलसिला चलता है और फिर दूसरे शंखनाद के साथ इसे रोक दिया जाता है।
इस पूरे आयोजन का धार्मिक पक्ष ही इसे सामान्य खेल या मुकाबले से अलग बनाता है। प्रतिभागियों के लिए यह केवल शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि मां वाराही के प्रति आस्था और पूर्वजों से चली आ रही परंपरा का निर्वहन है।
पत्थरों से फूल-फलों तक बदला बग्वाल का रूप
बग्वाल को पहले पाषाण युद्ध के रूप में भी जाना जाता रहा है। पुराने समय में पत्थरों के इस्तेमाल के कारण इसमें लोगों के घायल होने की घटनाएं होती थीं। समय के साथ सुरक्षा को लेकर इसमें बदलाव आया और आयोजन का स्वरूप पहले की तुलना में काफी नियंत्रित हुआ।
हालांकि बग्वाल की पहचान आज भी उसके पारंपरिक रोमांच से जुड़ी है, लेकिन फल और फूलों के इस्तेमाल ने इसे अपेक्षाकृत सुरक्षित रूप देने में भूमिका निभाई है। पुराने स्वरूप और वर्तमान परंपरा के बीच यही बदलाव देवीधुरा की बग्वाल को लगातार चर्चा में बनाए रखता है।
मेले में सिर्फ बग्वाल ही नहीं, संस्कृति भी बनेगी आकर्षण
13 दिन चलने वाले मेले में धार्मिक गतिविधियों के साथ स्थानीय लोक संस्कृति की झलक भी देखने को मिलेगी। उद्घाटन अवसर पर शोभायात्रा, ढोल-नगाड़े, छलिया नृत्य, कलश यात्रा और पारंपरिक वेशभूषा में लोगों की भागीदारी ने देवीधुरा के सांस्कृतिक रंग को सामने रखा। स्कूली बच्चों और स्थानीय कलाकारों की प्रस्तुतियां भी आयोजन का हिस्सा बनीं।
मेले के दौरान ग्रामीणों को सरकारी सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए बहुउद्देशीय शिविर समेत विभिन्न गतिविधियां भी प्रस्तावित हैं। प्रशासन की ओर से पेयजल, बिजली, सफाई, स्वास्थ्य, यातायात और सुरक्षा व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। 28 अगस्त को संभावित भीड़ को देखते हुए पुलिस व्यवस्था, सीसीटीवी और पार्किंग प्रबंधन को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
28 अगस्त पर रहेगी देशभर की नजर
अब देवीधुरा की निगाहें 28 अगस्त पर टिकी हैं। रक्षाबंधन के दिन जब चारों खामों की परंपरागत भागीदारी के बीच बग्वाल होगी, तब खोलीखाड़ दुर्वाचौड़ मैदान एक बार फिर इस अनूठी लोक परंपरा का साक्षी बनेगा।
देवीधुरा की बग्वाल की खासियत यही है कि समय के साथ इसके तौर-तरीकों में बदलाव आया, लेकिन इसके पीछे जुड़ी सामूहिक आस्था अब भी कायम है। यही कारण है कि आधुनिक दौर में भी यह आयोजन उत्तराखंड की लोक विरासत और धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान के प्रमुख प्रतीकों में गिना जाता है।

