देहरादून ; 20.08.2026।
अल्मोड़ा। उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में महिलाओं के हाथों में पीढ़ियों से मौजूद हुनर अब धीरे-धीरे रोजगार का रूप ले रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में प्रदेश में ग्रामीण आजीविका, स्वरोजगार और स्वयं सहायता समूहों को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है। इसी सोच को धरातल पर साकार करने वाली कहानियां अब गांवों से सामने आने लगी हैं। अल्मोड़ा के चौखुटिया क्षेत्र के पीपलधार गांव की भावना शर्मा ऐसी ही एक पहल के जरिए स्थानीय महिलाओं को हुनर से आत्मनिर्भरता की राह से जोड़ रही हैं।
भावना ने पहाड़ की परंपरा को आधुनिक बाजार की जरूरत से जोड़ने की दिशा में काम शुरू किया है। उनके साथ महिलाएं पहाड़ी दालों की पैकेजिंग, घर में तैयार किए जाने वाले अचार, ऐपण पेंटिंग, ऐपण फ्रेम, ऐपण साड़ियों और क्रोशिया के विभिन्न उत्पाद तैयार कर रही हैं। इस पहल की खासियत यह है कि इसमें स्थानीय संस्कृति, ग्रामीण संसाधन और महिलाओं के पारंपरिक कौशल—तीनों को एक साथ रोजगार से जोड़ा जा रहा है।
घर की कला को बाजार तक पहुंचाने की कोशिश
पहाड़ में ऐपण सिर्फ एक कला नहीं, बल्कि लोकजीवन और संस्कृति से जुड़ी पहचान रही है। चौखुटिया की महिलाओं के हाथों से तैयार होने वाली ऐपण की आकृतियों को अब सजावटी और उपयोगी उत्पादों के रूप में नया स्वरूप दिया जा रहा है। ऐपण फ्रेम और साड़ियों के जरिए इस पारंपरिक कला को घरों की चौखट से आगे बाजार तक पहुंचाने का प्रयास हो रहा है।
इसी तरह क्रोशिया के उत्पादों में भी महिलाओं की रचनात्मकता दिखाई दे रही है। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध हुनर को उपयोगी वस्तुओं में बदलने से महिलाओं के लिए काम के अवसर पैदा हो रहे हैं। इससे उन्हें अपने खाली समय का बेहतर उपयोग करने और अपनी कला के बदले आर्थिक लाभ हासिल करने का अवसर मिल रहा है।
पहाड़ी दाल और अचार में स्थानीय स्वाद की पहचान
भावना की पहल केवल हस्तकला तक सीमित नहीं है। पहाड़ी दालों की पैकेजिंग और अचार जैसे स्थानीय खाद्य उत्पादों को भी इस काम से जोड़ा गया है। पहाड़ के पारंपरिक खानपान को बेहतर पैकेजिंग और पहचान देकर बाजार में उतारने की दिशा में यह प्रयास महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय उत्पादों को बाजार से जोड़ना इसलिए भी अहम है, क्योंकि इससे उत्पाद तैयार करने वाली महिलाओं को अपने गांव और आसपास के क्षेत्र में ही आय का अवसर मिल सकता है। प्रदेश की ग्रामीण आजीविका व्यवस्था का भी उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को लाभकारी स्वरोजगार और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराकर उनकी आय को टिकाऊ तरीके से बढ़ाना है।
धामी सरकार की स्वरोजगार सोच से जुड़ती पहल
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में उत्तराखंड सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाने और पलायन की चुनौती से निपटने के लिए स्वरोजगार एवं स्थानीय उद्यमिता पर जोर दे रही है। ग्रामीण विकास विभाग की योजनाओं में मुख्यमंत्री उद्यमशाला योजना, ग्रामीण उद्यमिता और आजीविका से जुड़े कार्यक्रम तथा स्वयं सहायता समूहों को मजबूत करने की पहल शामिल हैं।
सरकार की मुख्यमंत्री स्वयं सहायता समूह सशक्तिकरण योजना भी महिलाओं के समूह आधारित आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। वहीं ग्रामीण आजीविका मिशन स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से ग्रामीण परिवारों को स्वरोजगार और आय के स्थायी अवसरों से जोड़ने पर काम करता है।
इसी व्यापक परिवेश में भावना शर्मा की पहल को देखा जाए तो यह उस बदलाव की तस्वीर पेश करती है, जिसमें पहाड़ की महिलाएं केवल रोजगार की तलाश करने वाली नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करने वाली भूमिका में भी आगे आ रही हैं।
हुनर के साथ बढ़ रहा आत्मविश्वास
भावना के साथ काम कर रहीं महिलाओं के लिए यह पहल आर्थिक गतिविधि के साथ-साथ आत्मविश्वास बढ़ाने का माध्यम भी बन रही है। पहाड़ के ग्रामीण इलाकों में जहां महिलाओं की बड़ी भूमिका परिवार और खेती-किसानी से जुड़ी रहती है, वहां अपने हुनर को उत्पाद में बदलकर आय अर्जित करना उनके आर्थिक निर्णयों में भागीदारी को मजबूत कर सकता है।
ऐसी पहल सरकार की उस सोच से भी मेल खाती है, जिसमें महिलाओं को कौशल, उद्यमिता और स्वरोजगार के अवसरों से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। उत्तराखंड के महिला एवं बाल विकास विभाग के कार्यक्रमों में भी महिलाओं की आजीविका, कौशल विकास, उद्यमिता और स्वरोजगार को बढ़ावा देने जैसे लक्ष्य शामिल हैं।
पलायन के बीच गांव में अवसर पैदा करने की उम्मीद
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार के सीमित अवसरों के कारण पलायन लंबे समय से बड़ी चुनौती रहा है। ऐसे में यदि स्थानीय उत्पादों को बाजार, बेहतर पैकेजिंग और नियमित बिक्री का माध्यम मिल सके तो गांवों में ही आय के नए रास्ते तैयार किए जा सकते हैं। सरकार की स्वरोजगार योजनाओं का एक उद्देश्य भी स्थानीय स्तर पर उद्यम और रोजगार को बढ़ावा देकर पलायन को कम करना है।
पीपलधार की भावना शर्मा की कोशिश इसी संभावना को सामने लाती है। उनका काम यह बताता है कि पहाड़ की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए हमेशा बड़े उद्योगों की ही जरूरत नहीं होती। कई बार एक स्थानीय उत्पाद, महिलाओं का सामूहिक हुनर और उसे बाजार तक पहुंचाने का प्रयास भी बदलाव की शुरुआत बन सकता है।
भावना की पहल में पहाड़ की संस्कृति भी है, स्थानीय स्वाद भी और महिलाओं की मेहनत भी। जरूरत अब इस प्रयास को निरंतर बाजार, प्रशिक्षण, ब्रांडिंग और बिक्री के बेहतर अवसरों से जोड़ने की है, ताकि पीपलधार जैसे गांवों की महिलाएं अपने हुनर को स्थायी आमदनी में बदल सकें और आत्मनिर्भर पहाड़ की तस्वीर को और मजबूत कर सकें।

