देहरादून ; 19.08.2026।
देहरादून। उत्तराखंड के गांवों में अब बारिश का आंकड़ा अनुमान या सीमित मौसम केंद्रों के आधार पर नहीं, बल्कि आधुनिक उपकरणों के जरिए दर्ज करने की तैयारी है। राज्य के 7,184 गांवों में ऑटोमैटिक रेन गेज लगाए जाएंगे। इससे गांव स्तर पर बारिश की वास्तविक मात्रा का रिकॉर्ड तैयार होगा और मौसम से जुड़े आंकड़े खेती से लेकर आपदा प्रबंधन तक कई क्षेत्रों में उपयोगी साबित होंगे।
केंद्र सरकार के सहयोग से लागू की जा रही विंड्स योजना के तहत राज्य में मौसम निगरानी का नेटवर्क मजबूत किया जा रहा है। योजना का उद्देश्य अलग-अलग क्षेत्रों से मौसम का अधिक सटीक और स्थानीय डेटा जुटाना है, ताकि बारिश, तापमान और नमी जैसी परिस्थितियों की बेहतर जानकारी समय पर मिल सके।
हर ब्लॉक में बनेगा मौसम निगरानी केंद्र
योजना के पहले चरण में राज्य के 95 ब्लॉकों में ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन (AWS) स्थापित किए जाने हैं। इनमें से 73 स्थानों पर उपकरण लगाए जा चुके हैं और इनसे मौसम संबंधी आंकड़े मिलना भी शुरू हो गया है। बाकी स्थानों पर काम पूरा करने के लिए सितंबर तक की समयसीमा तय की गई है।
ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन स्थानीय मौसम की स्थिति से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़े उपलब्ध कराएंगे। इससे किसी इलाके में मौसम का रुख किस दिशा में बदल रहा है, इसे समझने में मदद मिलेगी और मौसम आधारित कृषि सलाह को भी अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा।
799 जगहों पर लगेंगे अतिरिक्त उपकरण
विंड्स योजना के अगले चरण में राज्य के 799 स्थानों पर वर्षामापी और आर्द्रता मापने वाले उपकरण स्थापित किए जाएंगे। इसके साथ ही 7,184 गांवों में स्वचालित वर्षामापी लगाने की योजना है।
गांवों से सीधे मिलने वाले आंकड़ों का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि किसी खास क्षेत्र में कितनी बारिश हुई, इसका अधिक सटीक रिकॉर्ड तैयार किया जा सकेगा। इससे बारिश के स्थानीय पैटर्न को समझने और अलग-अलग क्षेत्रों की मौसम परिस्थितियों की तुलना करने में भी मदद मिलेगी।
किसानों को फसल बचाने में मिलेगी मदद
मौसम का सटीक डेटा किसानों के लिए खासा उपयोगी हो सकता है। बारिश की मात्रा और वातावरण में नमी की जानकारी समय पर मिलने से किसान सिंचाई और फसल प्रबंधन से जुड़े फैसले बेहतर तरीके से ले सकेंगे।
विशेष रूप से आलू जैसी फसलों में वातावरण में नमी बढ़ने पर रोग का खतरा बढ़ जाता है। यदि क्षेत्र में आर्द्रता लगातार बढ़ रही है तो उसके संकेत समय रहते मिल सकते हैं। इससे किसान संभावित बीमारी को लेकर पहले से सावधानी बरत सकेंगे और फसल को नुकसान से बचाने के लिए जरूरी कदम उठा सकेंगे।
इसी तरह यदि किसी इलाके में अपेक्षा से कम बारिश दर्ज होती है तो किसान अपनी फसल की जरूरत के अनुसार सिंचाई और अन्य कृषि गतिविधियों में बदलाव कर सकेंगे। अधिक बारिश की स्थिति में भी जलभराव और फसल क्षति से बचाव के लिए समय रहते तैयारी की जा सकेगी।
फसल बीमा के दावों में भी उपयोगी होगा रिकॉर्ड
बारिश और मौसम का प्रमाणिक स्थानीय रिकॉर्ड तैयार होने से फसल बीमा के मामलों में भी किसानों को लाभ मिलने की उम्मीद है। प्राकृतिक कारणों से फसल को हुए नुकसान का आकलन करते समय मौसम संबंधी आंकड़े महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं। इससे पात्र किसानों के बीमा दावों के निस्तारण में पारदर्शिता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
आपदा प्रबंधन और शोध में भी होगा इस्तेमाल
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में मौसम की सटीक निगरानी का महत्व और बढ़ जाता है। बारिश के आंकड़ों का इस्तेमाल आपदा प्रबंधन से जुड़े विभाग भी कर सकेंगे। किसी क्षेत्र में असामान्य वर्षा की स्थिति सामने आने पर स्थानीय प्रशासन को तैयारियों और जोखिम प्रबंधन में मदद मिल सकती है।
इसके अलावा कृषि विशेषज्ञों और शोध संस्थानों के लिए लंबे समय तक जुटाया गया मौसम डेटा काफी महत्वपूर्ण होगा। इससे बारिश के बदलते स्वरूप, फसलों पर मौसम के प्रभाव और स्थानीय जलवायु परिस्थितियों का अध्ययन करने में मदद मिलेगी।
केंद्र देगा 90 प्रतिशत राशि
उत्तराखंड में विंड्स योजना का संचालन उद्यान विभाग के माध्यम से किया जा रहा है। योजना के तहत कुल खर्च का 90 प्रतिशत केंद्र सरकार और 10 प्रतिशत राज्य सरकार वहन करेगी।
उपकरणों की स्थापना से लेकर उनके रखरखाव और डेटा उपलब्ध कराने का काम एक निजी संस्था के माध्यम से कराया जाएगा। संबंधित संस्था को मौसम उपकरणों की निगरानी और संचालन की जिम्मेदारी भी दी जाएगी। प्राप्त आंकड़ों की गुणवत्ता जांचने के लिए अलग व्यवस्था रखी जाएगी, ताकि उपलब्ध कराए जा रहे मौसम डेटा की विश्वसनीयता सुनिश्चित की जा सके।
गांव तक पहुंचेगा मौसम का भरोसेमंद आंकड़ा
योजना पूरी होने के बाद उत्तराखंड में मौसम की निगरानी केवल बड़े केंद्रों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि गांव स्तर तक इसका विस्तार होगा। 7,184 गांवों से मिलने वाला बारिश का डेटा राज्य को स्थानीय मौसम की अधिक स्पष्ट तस्वीर देने में मदद करेगा।
इससे किसानों को मौसम के अनुरूप खेती की रणनीति बनाने, फसल जोखिम घटाने और नुकसान का बेहतर आकलन करने में मदद मिल सकती है। साथ ही मौसम आधारित योजनाओं और आपदा प्रबंधन की तैयारियों के लिए भी राज्य के पास पहले से कहीं अधिक विस्तृत आंकड़े उपलब्ध होंगे।

