देहरादून : 19.08.2026।
देहरादून। उत्तराखंड में लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल करने की रणनीति पर भाजपा ने अभी से अपनी तैयारियों को धार देना शुरू कर दिया है। पार्टी का फोकस केवल सरकार के कामकाज तक सीमित नहीं है, बल्कि संगठन, निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच बेहतर तालमेल बनाकर चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी है। नेतृत्व का मानना है कि सरकार की उपलब्धियों को बूथ स्तर तक पहुंचाने और जनता के बीच संगठन की पकड़ मजबूत करने में समन्वित रणनीति अहम भूमिका निभाएगी।
भाजपा की इस रणनीति में उत्तराखंड के सभी आठ सांसदों को भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलने के संकेत हैं। लोकसभा के पांच और राज्यसभा के तीन सांसदों से विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी की स्थिति मजबूत करने, मौजूदा आधार को बनाए रखने और कमजोर क्षेत्रों में प्रदर्शन सुधारने की अपेक्षा की जा रही है। सांसदों की सक्रियता को केवल चुनावी प्रचार तक सीमित रखने के बजाय संगठनात्मक गतिविधियों और स्थानीय स्तर पर जनसंपर्क से जोड़ने की कोशिश होगी।
47 विधायकों को सिटिंग-गेटिंग से राहत
टिकट वितरण को लेकर भाजपा ने मौजूदा विधायकों के लिए फिलहाल राहत का संकेत दिया है। पार्टी का ‘सिटिंग-गेटिंग’ फॉर्मूला बरकरार रहने की स्थिति में वर्तमान 47 विधायकों को दोबारा चुनाव मैदान में उतरने का अवसर मिल सकता है। हालांकि अंतिम फैसला पार्टी के सर्वे, जमीनी फीडबैक और चुनावी परिस्थितियों के आधार पर ही होगा।
यह संकेत उन विधायकों के लिए भी अहम माना जा रहा है जिनकी क्षेत्र में पकड़ को लेकर पार्टी के आंतरिक आकलन में सवाल उठे हैं। अब ऐसे जनप्रतिनिधियों के सामने अपने प्रदर्शन में सुधार करने, कार्यकर्ताओं से दूरी कम करने और मतदाताओं के बीच सक्रियता बढ़ाने का अवसर है।
सांसदों के सामने सीट बढ़ाने की चुनौती
भाजपा की रणनीति सिर्फ मौजूदा विधानसभा सीटों को बचाने तक सीमित नहीं दिख रही। पार्टी चाहती है कि सांसद अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों में संगठन के साथ मिलकर नए क्षेत्रों में भी राजनीतिक आधार मजबूत करें। इसके लिए स्थानीय मुद्दों, विकास कार्यों और केंद्र तथा राज्य सरकार की योजनाओं को जनता तक प्रभावी तरीके से पहुंचाने पर जोर रहेगा।
संगठन और सरकार के बीच तालमेल पर जोर
आगामी चुनाव को देखते हुए पार्टी नेतृत्व का जोर इस बात पर है कि सरकार के स्तर पर लिए गए फैसलों और संगठन की चुनावी रणनीति के बीच कोई अंतर न रहे। विधायकों और सांसदों को भी संगठन के साथ लगातार संवाद बनाए रखने की दिशा में सक्रिय किया जा सकता है। इससे स्थानीय स्तर पर उठने वाली नाराजगी और समस्याओं की जानकारी समय रहते नेतृत्व तक पहुंचाने में मदद मिलेगी।
भाजपा के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती अपने मौजूदा राजनीतिक दबदबे को बनाए रखने के साथ-साथ उन सीटों पर बढ़त बनाना है जहां पिछले चुनाव में पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी। ऐसे में सरकार का प्रदर्शन, संगठन की सक्रियता और जनप्रतिनिधियों की क्षेत्र में मौजूदगी—तीनों को आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों का प्रमुख आधार बनाया जा रहा है।

