17.08.2026 ; देहरादून।
उत्तरकाशी। उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित प्रसिद्ध दयारा बुग्याल एक बार फिर अपनी अनूठी लोक परंपरा और पहाड़ी संस्कृति का साक्षी बना। समुद्र तल से करीब 11 हजार फीट की ऊंचाई पर आयोजित होने वाला अढूंड़ी उत्सव, जिसे अब देश-दुनिया में ‘बटर फेस्टिवल’ के नाम से भी पहचान मिल चुकी है, में प्रकृति, धार्मिक आस्था और पशुपालक जीवन की खूबसूरत झलक देखने को मिलती है।
मखमली घास से ढके विशाल बुग्याल में आयोजित इस उत्सव की सबसे खास बात यहां खेली जाने वाली अनोखी होली है। रंग और गुलाल की जगह दूध, दही, मक्खन और मट्ठे का इस्तेमाल किया जाता है। उत्सव के दौरान बुग्याल का वातावरण पारंपरिक गीत-संगीत, ढोल-दमाऊं की थाप और लोक नृत्यों से जीवंत हो उठता है।
रैथल गांव से शुरू होती है धार्मिक यात्रा
अढूंड़ी उत्सव की परंपरा पंचगाई पट्टी के रैथल गांव से जुड़ी है। ग्रामीण अपने आराध्य समेश्वर देवता की देवडोली के साथ पारंपरिक तरीके से दयारा बुग्याल की ओर रवाना होते हैं। देवडोली के बुग्याल पहुंचने के बाद धार्मिक विधि-विधान और पूजा-अर्चना की जाती है। इस दौरान बड़ी संख्या में ग्रामीण और पर्यटक इस पारंपरिक आयोजन का हिस्सा बनते हैं।
पशुधन और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का पर्व
अढूंड़ी केवल मनोरंजन का उत्सव नहीं, बल्कि पहाड़ के पशुपालक समाज की जीवनशैली और प्रकृति से उसके गहरे रिश्ते को भी दर्शाता है। गर्मियों के मौसम में ग्रामीण अपने मवेशियों को बुग्यालों में चराने के लिए लेकर आते हैं। इसी परंपरा से जुड़ी मान्यता के अनुसार भगवान कृष्ण और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने के उद्देश्य से यह पर्व मनाया जाता है।
दूध और उससे बने उत्पादों का उत्सव में विशेष महत्व होना भी पहाड़ी पशुपालन संस्कृति को दर्शाता है। यही वजह है कि यहां की होली में पारंपरिक रंगों के बजाय दूध, दही और मक्खन दिखाई देता है।
मक्खन की हांडी फूटते ही शुरू हो जाता है उत्सव
पूजा-अर्चना के बाद उत्सव का सबसे आकर्षक चरण आता है। मक्खन से भरी हांडी फोड़ी जाती है और इसके बाद उत्सव का माहौल पूरी तरह रंगीन हो जाता है। लोग एक-दूसरे के चेहरे पर मक्खन लगाते हैं, जबकि दही और मट्ठे की बौछार के बीच जमकर उत्सव मनाया जाता है।
इस अनोखी परंपरा में स्थानीय ग्रामीणों के साथ पर्यटक भी उत्साह से शामिल होते हैं। ऊंचे पहाड़ों के बीच दूध-मक्खन से खेली जाने वाली यह होली दयारा बुग्याल को दूसरे पर्यटन स्थलों से अलग पहचान देती है।
ढोल-दमाऊं की थाप पर थिरकते हैं ग्रामीण और पर्यटक
उत्सव में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ लोक संस्कृति भी प्रमुख आकर्षण रहती है। ढोल-दमाऊं की पारंपरिक धुनों के बीच रासौ और तांदी जैसे लोक नृत्य प्रस्तुत किए जाते हैं। स्थानीय लोग पारंपरिक अंदाज में नृत्य करते हैं और कई पर्यटक भी इस सांस्कृतिक रंग में शामिल हो जाते हैं।
हरे-भरे बुग्याल, दूर तक फैली पहाड़ों की चोटियां, पारंपरिक वाद्य यंत्रों की आवाज और सामूहिक नृत्य मिलकर अढूंड़ी उत्सव को बेहद खास बना देते हैं।
पुरानी परंपरा ने बदला अपना स्वरूप
स्थानीय परंपराओं के अनुसार अढूंड़ी उत्सव का स्वरूप समय के साथ बदलता रहा है। पुराने दौर में उत्सव के दौरान प्रतीकात्मक रूप से गोबर फेंकने की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है। समय के साथ इस परंपरा ने नया रूप लिया और दूध, दही, मक्खन व मट्ठे से उत्सव मनाने की परंपरा अधिक प्रमुख हो गई।
आज यही अनूठा स्वरूप दयारा बुग्याल के अढूंड़ी उत्सव की पहचान बन चुका है। धार्मिक आस्था, पशुपालन, लोक संगीत और प्राकृतिक सौंदर्य का यह मेल उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को देश-दुनिया के सामने प्रस्तुत करता है।
दयारा बुग्याल का यह आयोजन सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि पहाड़ के उस जीवन दर्शन की झलक है जिसमें प्रकृति के प्रति सम्मान, देव आस्था और पशुधन के प्रति लगाव एक साथ दिखाई देते हैं। इसी वजह से अढूंड़ी उत्सव हर साल स्थानीय लोगों के साथ पर्यटकों के लिए भी खास आकर्षण बना हुआ है।

