21 june 2026 ; Dehradun!
देहरादून। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी)-2020 के प्रभावी और समयबद्ध क्रियान्वयन की दिशा में उत्तराखंड सरकार ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है। राज्य सरकार ने निर्णय लिया है कि विश्वविद्यालयों एवं राजकीय महाविद्यालयों में प्रत्येक शैक्षणिक सत्र के दौरान न्यूनतम 180 दिन, जबकि प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में 220 दिन नियमित कक्षाओं का संचालन सुनिश्चित किया जाएगा। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण, निरंतर और परिणामोन्मुख शिक्षा उपलब्ध कराना है।
यह निर्णय सचिवालय में आयोजित राज्य स्तरीय टास्क फोर्स की बैठक के दौरान लिया गया। बैठक की अध्यक्षता शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने की। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के सभी प्रमुख प्रावधानों को तय समयसीमा के भीतर प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, ताकि प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था नई नीति के अनुरूप मजबूत हो सके।
बैठक में विशेष रूप से रोजगारोन्मुख शिक्षा को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया। इसके तहत उच्च शिक्षा संस्थानों में पाठ्यक्रमों को वर्तमान समय की आवश्यकताओं के अनुरूप अपडेट करने, विद्यार्थियों के लिए क्रेडिट ट्रांसफर व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने, बहुविषयक शिक्षा (मल्टीडिसिप्लिनरी एजुकेशन) को बढ़ावा देने तथा मल्टीपल एंट्री-एग्जिट सिस्टम को चरणबद्ध तरीके से लागू करने पर चर्चा हुई। इससे विद्यार्थियों को अपनी रुचि और परिस्थितियों के अनुसार शिक्षा जारी रखने में अधिक लचीलापन मिलेगा।
राज्य सरकार भारतीय ज्ञान परंपरा को भी शिक्षा प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने की दिशा में काम कर रही है। इसके अंतर्गत भारतीय संस्कृति, परंपरागत ज्ञान, नैतिक मूल्यों और स्थानीय विरासत से जुड़े विषयों को पाठ्यक्रम में समुचित स्थान देने की योजना पर भी बल दिया गया, ताकि विद्यार्थियों का समग्र विकास सुनिश्चित हो सके।
शिक्षा विभाग का मानना है कि नियमित शैक्षणिक दिवसों की संख्या बढ़ने से पढ़ाई की गुणवत्ता में सुधार होगा, पाठ्यक्रम समय पर पूरा होगा और विद्यार्थियों की सीखने की क्षमता में सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेगा। साथ ही, रोजगार आधारित शिक्षा और आधुनिक शिक्षण प्रणाली के बेहतर समन्वय से युवाओं को भविष्य की प्रतिस्पर्धी चुनौतियों के लिए अधिक सक्षम बनाया जा सकेगा।
राज्य सरकार का यह कदम उत्तराखंड में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है, जिससे स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा तक शैक्षणिक व्यवस्था को अधिक मजबूत, लचीला और रोजगार-केंद्रित बनाने में मदद मिलेगी।

