16 july 2026 : Dehradun!
उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान माने जाने वाले प्रमुख लोकपर्व हरेला का पर्व वर्ष 2026 में 16 जुलाई, गुरुवार को मनाया जाएगा। यह पर्व कर्क संक्रांति के अवसर पर मनाया जाता है और प्रकृति, हरियाली, कृषि तथा पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है। हरेला केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने और आने वाली अच्छी फसल की कामना का भी प्रतीक है।
16 जुलाई 2026 को कब मनाया जाएगा हरेला?
हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में कर्क संक्रांति 16 जुलाई, गुरुवार को पड़ रही है। इसी दिन उत्तराखंड के कुमाऊं और कई अन्य क्षेत्रों में हरेला पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाएगा। यह पर्व वर्षा ऋतु और नई कृषि शुरुआत का भी संकेत माना जाता है।
10 दिन पहले शुरू होती है हरेला की तैयारी
हरेला पर्व की तैयारियां लगभग दस दिन पहले शुरू हो जाती हैं। परिवार के बड़े सदस्य या महिलाएं घर में एक छोटे पात्र या टोकरी में शुद्ध मिट्टी भरकर उसमें सात प्रकार के अनाज के बीज बोती हैं। इन बीजों को प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा पानी दिया जाता है ताकि उनमें नए अंकुर निकल सकें।
नौवें दिन उगे हुए पौधों की हल्की सफाई की जाती है और दसवें दिन उन्हें काटकर पूजा के लिए तैयार किया जाता है। इस दौरान कई स्थानों पर पारंपरिक मंगलगीत भी गाए जाते हैं, जो इस लोकपर्व की सांस्कृतिक सुंदरता को और बढ़ाते हैं।
हरेला में क्यों बोए जाते हैं सात प्रकार के बीज?
हरेला पर्व में धान, गेहूं, जौ, मक्का, गहत, उड़द और सरसों जैसे सात प्रकार के बीज बोने की परंपरा है। इन सात अनाजों को कृषि समृद्धि, उर्वरता और जीवन के संतुलन का प्रतीक माना जाता है।
मान्यता है कि अलग-अलग बीजों का एक साथ अंकुरित होना आने वाले समय में अच्छी फसल, परिवार की खुशहाली और प्रकृति के संतुलन का शुभ संकेत देता है। यह परंपरा लोगों को खेती और पर्यावरण के महत्व से भी जोड़ती है।
भगवान शिव और माता पार्वती को अर्पित किया जाता है हरेला
दसवें दिन उगे हुए हरे अंकुर सबसे पहले भगवान शिव और माता पार्वती को अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद परिवार के सभी सदस्यों के सिर पर हरेला रखा जाता है और सुख, समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य तथा दीर्घायु की कामना की जाती है। इस पारंपरिक प्रक्रिया को स्थानीय भाषा में ‘हरेला पतीसना’ कहा जाता है।
पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है हरेला
आज के समय में हरेला पर्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। यह प्रकृति संरक्षण और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का भी संदेश देता है। उत्तराखंड में इस अवसर पर बड़ी संख्या में वृक्षारोपण अभियान चलाए जाते हैं, जिनमें लोग पौधे लगाकर हरियाली बढ़ाने का संकल्प लेते हैं। यही कारण है कि हरेला को प्रकृति और मानव के बीच संतुलन बनाए रखने वाला महत्वपूर्ण लोकपर्व माना जाता है।
हरेला पर्व का महत्व
हरेला पर्व जीवन में हरियाली, समृद्धि और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व लोगों को प्रकृति के साथ जुड़ने, कृषि परंपराओं का सम्मान करने और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक रहने की प्रेरणा देता है। उत्तराखंड की लोकसंस्कृति में हरेला केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति, परिवार और समाज के बीच गहरे संबंधों का जीवंत उत्सव है।

