25 june 2026
काशीपुर/ऊधमसिंह नगर। सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त आधिकारिक आंकड़ों ने ऊधमसिंह नगर जिले में अपराधों की जांच, अभियोजन और न्यायिक प्रक्रिया की मौजूदा स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वर्ष 2025 के दौरान विशेष पॉक्सो अदालतों और गंभीर आपराधिक मामलों से संबंधित अदालतों में हुए निस्तारण के आंकड़े बताते हैं कि बड़ी संख्या में मामलों में आरोपी दोषमुक्त हो रहे हैं, जबकि लंबित मामलों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति केवल न्यायालयों के सामने मौजूद कार्यभार का संकेत नहीं है, बल्कि जांच एजेंसियों, अभियोजन तंत्र और न्यायिक प्रक्रिया की कई व्यावहारिक चुनौतियों को भी उजागर करती है।
आरटीआई कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता नदीम उद्दीन को संयुक्त निदेशक अभियोजन कार्यालय, ऊधमसिंह नगर द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार जिले की विशेष पॉक्सो अदालतों में वर्ष 2025 के दौरान कुल 141 मामलों का निस्तारण किया गया। इनमें केवल 27 मामलों में ही आरोप सिद्ध हो सके और दोषियों को सजा सुनाई गई। दूसरी ओर 99 मामलों में आरोपी अदालत से बरी हो गए, जबकि 15 मामलों का निस्तारण क्वैश, दाखिल दफ्तर अथवा अन्य कानूनी प्रक्रियाओं के तहत किया गया।
इन आंकड़ों के आधार पर वर्ष 2025 में पॉक्सो मामलों की दोषसिद्धि दर लगभग 21 प्रतिशत रही। दूसरे शब्दों में कहें तो निस्तारित हुए प्रत्येक 100 मामलों में केवल 21 मामलों में ही अभियोजन पक्ष अदालत के समक्ष आरोप साबित कर पाया, जबकि अधिकांश मामलों में आरोपियों को राहत मिल गई। बाल यौन अपराधों जैसे संवेदनशील मामलों में यह स्थिति चिंता का विषय मानी जा रही है।
नए मामलों की तुलना में निस्तारण की गति धीमी
आरटीआई से प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्ष 2025 की शुरुआत में जिले की विशेष पॉक्सो अदालतों में 645 मामले लंबित थे। वर्ष के दौरान 188 नए मामले दर्ज हुए, जिससे कुल मामलों की संख्या 833 तक पहुंच गई। हालांकि अदालतों ने 141 मामलों का निस्तारण किया, लेकिन नए मामलों की लगातार आमद के कारण लंबित मामलों की संख्या कम होने के बजाय बढ़कर 692 हो गई।
आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि न्यायालयों द्वारा किए जा रहे निस्तारण की गति नए मामलों के पंजीकरण की तुलना में कम है। यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में लंबित मामलों का बोझ और अधिक बढ़ सकता है। इसका सीधा प्रभाव पीड़ितों, उनके परिवारों और न्याय की प्रतीक्षा कर रहे लोगों पर पड़ सकता है, जिन्हें वर्षों तक अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं।
गंभीर अपराधों में भी संतोषजनक नहीं स्थिति
आरटीआई के तहत उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों में भारतीय दंड संहिता (IPC) के गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों की स्थिति भी सामने आई है। हत्या, हत्या के प्रयास, दुष्कर्म, अपहरण और अन्य गंभीर अपराधों से संबंधित मामलों में दोषसिद्धि दर केवल 31 प्रतिशत दर्ज की गई। इसका अर्थ है कि ऐसे मामलों में भी बड़ी संख्या में आरोपी अदालत से बरी हो रहे हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि गंभीर अपराधों में कम दोषसिद्धि दर कई स्तरों पर चिंताजनक है। एक ओर इससे पीड़ित पक्ष को न्याय मिलने में कठिनाई होती है, वहीं दूसरी ओर अपराध नियंत्रण और कानून व्यवस्था पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। दोषसिद्धि दर किसी भी आपराधिक न्याय प्रणाली की प्रभावशीलता का महत्वपूर्ण संकेतक मानी जाती है।
आखिर क्यों कमजोर पड़ जाता है अभियोजन पक्ष?
विशेषज्ञों के अनुसार कम दोषसिद्धि दर के पीछे कई कारण हो सकते हैं। कई मामलों में प्रारंभिक जांच के दौरान महत्वपूर्ण साक्ष्य एकत्र नहीं हो पाते। कहीं घटनास्थल का वैज्ञानिक परीक्षण समय पर नहीं हो पाता तो कहीं फोरेंसिक रिपोर्ट में देरी हो जाती है। इसके अलावा गवाहों का मुकर जाना, पीड़ित पक्ष पर सामाजिक या पारिवारिक दबाव, समझौते की कोशिशें और मुकदमों के लंबे समय तक चलने जैसी परिस्थितियां भी अभियोजन पक्ष को कमजोर कर देती हैं।
पॉक्सो मामलों में यह समस्या और अधिक जटिल हो जाती है क्योंकि पीड़ित बच्चे होते हैं। लंबे समय तक चलने वाली कानूनी प्रक्रिया के दौरान कई बार बच्चों के बयान बदल जाते हैं या वे मानसिक दबाव में आ जाते हैं। ऐसे मामलों में अदालत के सामने आरोप सिद्ध करना और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
न्याय मिलने में देरी का सामाजिक प्रभाव
कानूनी जानकारों का मानना है कि किसी भी आपराधिक मामले में न्याय मिलने में अत्यधिक देरी पीड़ित और उसके परिवार के लिए अतिरिक्त मानसिक पीड़ा का कारण बनती है। विशेषकर पॉक्सो जैसे मामलों में लंबित मुकदमों की बढ़ती संख्या समाज में यह संदेश भी देती है कि न्यायिक प्रक्रिया अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ रही है। इससे लोगों का भरोसा प्रभावित होने की आशंका भी रहती है।
जांच और अभियोजन तंत्र को मजबूत करने की जरूरत
विशेषज्ञों का कहना है कि दोषसिद्धि दर बढ़ाने के लिए केवल अदालतों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए पुलिस जांच को अधिक पेशेवर और वैज्ञानिक बनाना होगा। फोरेंसिक साक्ष्यों का बेहतर उपयोग, डिजिटल सबूतों का संरक्षण, गवाह संरक्षण योजना का प्रभावी क्रियान्वयन और अभियोजन अधिकारियों को नियमित प्रशिक्षण देना भी आवश्यक है।
इसके अलावा लंबित मामलों को कम करने के लिए विशेष अदालतों में पर्याप्त न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति, आधुनिक तकनीक का उपयोग और समयबद्ध सुनवाई की व्यवस्था को भी मजबूत करने की जरूरत है।
RTI ने दिखाया जमीनी सच
आरटीआई के माध्यम से सामने आए ये आंकड़े केवल सांख्यिकीय जानकारी नहीं हैं, बल्कि जिले की आपराधिक न्याय प्रणाली की वास्तविक स्थिति का आईना भी हैं। एक ओर बाल यौन अपराधों में दोषसिद्धि दर महज 21 प्रतिशत रहना चिंता बढ़ाता है, वहीं दूसरी ओर गंभीर अपराधों में 31 प्रतिशत की दोषसिद्धि दर भी कई सवाल खड़े करती है। बढ़ते लंबित मामलों के बीच यह आवश्यक हो जाता है कि जांच एजेंसियां, अभियोजन विभाग और न्यायपालिका मिलकर ऐसी रणनीति तैयार करें, जिससे मामलों का त्वरित और प्रभावी निस्तारण हो सके तथा पीड़ितों को समय पर न्याय मिल सके।
RTI से सामने आए ये आंकड़े अब ऊधमसिंह नगर में न्यायिक व्यवस्था की कार्यक्षमता, जांच की गुणवत्ता और अभियोजन तंत्र की मजबूती पर व्यापक चर्चा का आधार बन गए हैं। आने वाले समय में इन चुनौतियों से निपटने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं, इस पर सभी की निगाहें टिकी रहेंगी।

