20 june 2026
नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने उचित मूल्य दुकान (राशन दुकान) संचालकों के अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि राशन दुकान का लाइसेंस निरस्त करने वाले आदेश पर जिलाधिकारी (डीएम) के हस्ताक्षर नहीं हैं, तो ऐसा आदेश कानूनी रूप से मान्य नहीं माना जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल किसी अन्य अधिकारी द्वारा आदेश की सूचना भेज देने से उसे सक्षम प्राधिकारी का आदेश नहीं माना जा सकता।
यह फैसला न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ ने एक राशन विक्रेता द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ता ने वर्ष 2018 में जारी उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उसकी उचित मूल्य दुकान का लाइसेंस रद्द कर दिया गया था। साथ ही उसने उस अपीलीय आदेश को भी अदालत में चुनौती दी, जिसमें लाइसेंस निरस्तीकरण को बरकरार रखा गया था।
हस्ताक्षर न होने पर उठे सवाल
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि लाइसेंस निरस्तीकरण आदेश के किसी भी पृष्ठ पर जिलाधिकारी के हस्ताक्षर मौजूद नहीं हैं। ऐसे में यह नहीं माना जा सकता कि आदेश वास्तव में सक्षम प्राधिकारी द्वारा पारित किया गया था। याचिका में यह भी कहा गया कि आदेश जिला पूर्ति अधिकारी की ओर से जारी किया गया प्रतीत होता है, जबकि नियमों के अनुसार राशन दुकान का लाइसेंस रद्द करने का अधिकार केवल जिलाधिकारी के पास है।
हाईकोर्ट ने मंगवाए मूल अभिलेख
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने संबंधित विभाग से मूल अभिलेख तलब किए। इसके अलावा उधम सिंह नगर जिलाधिकारी कार्यालय के संबंधित कर्मचारी को भी रिकॉर्ड सहित अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया गया। रिकॉर्ड की जांच के दौरान यह तथ्य सामने आया कि विवादित आदेश पर वास्तव में जिलाधिकारी के हस्ताक्षर नहीं थे।
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि आदेश जिला पूर्ति अधिकारी के हस्ताक्षर से संबंधित व्यक्ति को भेजा गया था, इसलिए प्रक्रिया में कोई त्रुटि नहीं मानी जानी चाहिए। हालांकि अदालत इस तर्क से सहमत नहीं हुई।
सक्षम प्राधिकारी का आदेश होना अनिवार्य
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि शासनादेश के अनुसार राशन दुकान का लाइसेंस निरस्त करने का अधिकार केवल जिलाधिकारी को प्राप्त है। जब कानून किसी विशेष अधिकारी को निर्णय लेने का अधिकार देता है, तो उसी अधिकारी की स्वीकृति और हस्ताक्षर आवश्यक होते हैं। यदि आदेश पर उसके हस्ताक्षर ही नहीं हैं, तो उसे वैध प्रशासनिक आदेश नहीं माना जा सकता।
अदालत ने कहा कि किसी अन्य अधिकारी द्वारा आदेश को अग्रेषित कर देना या उसकी सूचना भेज देना, मूल आदेश में मौजूद कानूनी कमी को दूर नहीं कर सकता।
दोनों आदेश किए निरस्त
मामले में अदालत ने पाया कि लाइसेंस निरस्तीकरण आदेश ही विधिसम्मत नहीं था। इसलिए उसके आधार पर पारित अपीलीय आदेश भी टिक नहीं सकता। परिणामस्वरूप हाईकोर्ट ने 19 नवंबर 2018 के लाइसेंस निरस्तीकरण आदेश और उसके विरुद्ध पारित अपीलीय आदेश दोनों को रद्द कर दिया।
प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण संदेश
इस फैसले को प्रशासनिक कार्यवाही में कानूनी प्रक्रियाओं के पालन के दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया है कि किसी भी प्रशासनिक निर्णय को वैधानिक रूप से प्रभावी बनाने के लिए सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति और आवश्यक औपचारिकताओं का पालन अनिवार्य है। अन्यथा ऐसे आदेश न्यायिक समीक्षा में टिक नहीं पाएंगे।
यह निर्णय भविष्य में सरकारी अधिकारियों द्वारा पारित किए जाने वाले प्रशासनिक आदेशों की वैधता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।

